जैन धर्म के हिसाब से पुण्य प्रबल है या पुरुषार्थ
जैन धर्म के अनुसार पुरुषार्थ (स्वयं का प्रयास) पुण्य से अधिक महत्वपूर्ण और प्रबल माना गया है। पुण्य (अच्छे कर्मों का फल) अवश्य ही सुखद परिस्थितियाँ प्रदान कर सकता है, लेकिन अंतिम मुक्ति (मोक्ष) की प्राप्ति केवल पुरुषार्थ, यानी आत्म-संयम, तप, स्वाध्याय, और सम्यक् ज्ञान-चरित्र से ही संभव है।
भगवान महावीर ने भी उपदेश दिया है— "पुरुषार्थो महायशः" अर्थात् महानता और मोक्ष केवल पुरुषार्थ से ही प्राप्त होती है।
पुण्य का फल संसार में सुखद परिस्थितियाँ देने तक सीमित है, लेकिन अगर मनुष्य पुरुषार्थ न करे, तो पुण्य भी मोक्ष का कारण नहीं बन सकता। इसलिए जैन दर्शन में पुरुषार्थ को ही प्रधान बताया गया है।
सारांश: जैन धर्म के अनुसार पुण्य से बढ़कर पुरुषार्थ प्रबल है, क्योंकि मोक्ष की प्राप्ति केवल पुरुषार्थ से ही संभव है।