नेत्र और मन से कौन सा ज्ञान नहीं होता है? अर्थावग्रह, ध्रुवज्ञान, अध्रुवज्ञान, व्यंजनावग्रह
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उत्तर: व्यञ्जनावग्रह नेत्र (आँख) और मन से नहीं होता।
अर्थ: व्यञ्जनावग्रह वह अवस्था है जिसमें इंद्रियाँ (अन्य चार इंद्रियाँ) के साथ होने वाला अस्पष्ट/अविश्वासक धारणात्मक अनुभव आता है, पर आँखों और मन से यह स्थिति नहीं बनती। खास तौर पर जैन दर्शन में कहा गया है कि नेत्र और मन से व्यञ्जनावग्रह नहीं होता।
Digambar और Śvetāmbara दोनों परंपराओं में इसका मौलिक विचार एक ही है: यह ज्ञान नेत्र-मन से संभव नहीं है; isto न केवल दृश्य परिक्षण का भाग है, बल्कि अन्य इंद्रियों के संवेदी क्रम में आने वाला एक विशिष्ट अवस्था है।
Note: अगर आप चाहें, मैं इस विषय पर ठोस सूत्रों के अनुसार अधिक सरल व्याख्या दे सकता/सकती हूँ।