संयमपरिणाम की वृद्धि होने से ज्ञान में गिरावट का न होना - अप्रतिपात, प्रतिपात, दोनों, दोनों नहीं
उत्तर: अप्रतिपात (अप्रतिपात)
व्याख्या: संयमपरिणाम की वृद्धि होने पर भी ज्ञान में गिरावट नहीं होती—यह अवधारणा अप्रतिपात को सूचित करती है. इसका मतलब है कि जैसे-जैसे साधना, संयम एवं आत्मसंयम बढ़ता है, वैद्यार्थ ज्ञान में कमी नहीं आती; ज्ञान स्थिर रहता या और स्पष्ट होता है।
नोट: Jain साहित्य में इस प्रकार की स्थितियाँ बार-बार स्पष्ट की जाती हैं कि आत्म-विकास से ज्ञान पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता; कुछ स्थानों पर Digambar/Śvetāmbara परंपराओं में आवृत्ति के अनुसार शब्दार्थ में थोड़ा-बहुत भिन्नता मिलती है, लेकिन मूल विचार यही रहता है: संयम बढ़ाने से ज्ञान नहीं घटता।