भरत की दिग्विजय यात्रा कब समाप्त हुई
भरत चक्रवर्तीजी की दिग्विजय यात्रा समाप्त कैसे हुई, यह दो प्रमुख Jain परंपराओं में थोड़ा अलग वर्णन मिलता है:
- Digambara परंपरा: भरत ने अपने vieillage (बुढ़ापा) के दौरान वैराग्य धारण किया और तत्कालिक मोक्ष-मार्ग की प्राप्ति (केवलज्ञान) कर लिया। इसके बाद ही उनकी दिग्विजय समाप्त मानी जाती है; उनके अंग-प्रत्यंगों के कृत्य और उनके जीवन के अंत तक क्या-क्या हुआ, यह वैराग्य के साथ जुड़ा हुआ माना जाता है.
- Śvetāmbara परंपरा: भरत ने पहले केवल ज्ञान प्राप्त कर लिया, फिर संसार छोड़कर मोक्ष की ओर प्रस्थान किया (वह बाद में वैराग्य भी माने जाते हैं)। बहुधा कहा जाता है कि पिता के निधन के बाद उनके ज्ञान-प्राप्ति की घटनाओं का क्रम सामने आता है, फिर वे वैराग्य की ओर बढ़ते हैं।
सार यह है कि दिग्विजय का “ख़त्म” उनके वैराग्य और kevala jnana प्राप्ति से जुड़ा है, पर Digambar और Śvetāmbara मान्यताओं में क्रम और कारणों में थोडा फर्क रहता है।
आप चाहें तो इन कथा-रेखाओं को देखना चाहें तो नीचे एक Jain Knowledge पन्ने से पढ़ सकते हैं: <आंख लिंक>