श्रुतलेखन परंपरा कब प्रारंभ हुई
श्रुति-lekhan (श्रुत-ग्यान को लिखित रूप में संजोना) की परंपरा दो मुख्य प्रवृत्तियों में वर्षित मानी जाती है:
- Digambar परंपरा: Shrut Panchami की घटना से जुड़ी मान्यता के अनुसार Dharasenacharya के समय, लगभग 1st century CE में Pushpadant और Bhutabali ने Girnar की गुफाओं में शत्र्खन्दार्गम (Shatkhandagam) जैसी ग्रंथ लिखवाकर श्रुत-ज्ञान को लिखित रूप में संरक्षित किया। इसे Shrut Panchami के रूप में याद किया जाता है। तत्पश्चात् इन ग्रंथों को पढ़ाने-लिखवाने की परंपरा आगे बढ़ी। ( jainknowledge.com, jainheritagecentres.com)
- Śvetāmbara परंपरा: स्वेतांबरacji (श्वेतांबर) परंपरा के अनुसार आचार्यों के councils (संकलन/काव्य-लिपिबद्ध) के बीच भागो में भगवद्वाणी को लिखित रूप दिया गया, और afaka दूषण-पटलिका के दौरान पटलिपुत्र (Pataliputra) के council में संकलन का मानक प्रचलित माना गया—लगभग ईसा-पूर्व 463–367 BCE के आस-पास की अवधि में। इसके बाद आगे की शास्त्र-संरचना और संकलन भी होते रहे। दुर्भरअर्थ में Digambar बनाम Śvetāmbara के बीच समय-रेखा और संकलन-स्थलों में भिन्नता पाई जाती है; किन्तु दोनों ही परंपराओं में Shruti-ज्ञान का संजोना और पूजा-चर्चा का केंद्र बना रहा। ( en.wikipedia.org)
संक्षेप में
- Shrut lekhan की पहली लिखित-रचना Digambar परंपरा के अनुसार 1st century CE के आसपास Dharasenacharya से जुड़ी मान्यता के साथ शुरू मानी जाती है (Shatkhandagam को लिखवाना). ( jainknowledge.com)
- Śvetāmbara परंपरा में लेखन-सम्पादन और संकलन का प्रभावी प्रारम्भ लगभग ईसा-पूर्व काफी पहले, पटलिपुत्र-काउंल के दौर में माना जाता है (विविध स्रोत-रेखाओं के अनुसार 463–367 BCE के आस-पास). ( en.wikipedia.org)
नोट: ऊपर दी गई तिथियाँ परंपरागत मान्यताओं और विद्वत-आलोचनाओं के अनुसार भिन्न हो सकती हैं, Digambar और Śvetāmbara दोनों की रिकॉर्डिंग-प्रणालियाँ अलग-अलग संदर्भित हैं।