Gagan Kaun se ling se siddh hue
जैन धर्म के अनुसार "गगन" शब्द किसी विशेष तीर्थंकर, साधु या सिद्ध पुरुष के संदर्भ में प्रसिद्ध नहीं है। जैन धर्म में "सिद्ध" वे आत्माएँ होती हैं, जिन्होंने जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर सिद्धशिला में निवास प्राप्त कर लिया है। सिद्ध बनने के लिए जीव को मोक्ष मार्ग का पालन करना पड़ता है—जिसमें सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र (तीनों रत्नत्रय) का पालन करना आवश्यक है।
"लिंग" का यहाँ अर्थ है—श्वेतांबर या दिगंबर संप्रदाय के अनुसार भेष (वेशभूषा)। श्वेतांबर साधु सफेद वस्त्र पहनते हैं, जबकि दिगंबर साधु नग्न रहते हैं।
जैन दर्शन के अनुसार मोक्ष (सिद्ध अवस्था) प्राप्ति के लिए बाह्य लिंग या वेश का नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और चारित्र की प्रधानता होती है। दोनों संप्रदायों के अनुसार उनके साधु–साध्वियाँ मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं।
यदि आप किसी विशेष गगन नामक साधु के बारे में पूछ रहे हैं, तो कृपया अधिक स्पष्ट जानकारी दें। सामान्य रूप से—सिद्ध बनने के लिए शुद्ध आत्मा, चारित्र और रत्नत्रय का पालन आवश्यक है, न कि केवल बाह्य लिंग।