why did different sub sects start, did people disagree with the oG ones?
यह सवाल बहुत है और उसमें कई सचाईयाँ छुपी हैं, पर संक्षेप में जो समझना जरूरी है वो यह है:
- जैन साधुओं और भक्तों के बीच प्रारम्भिक शिक्षाओं के बाद वक्त के साथ भिन्न-भिन्न समूह बने। यह केवल “शास्त्रों” का नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन के अनुशीलन के तरीकों, दिग्गज-श्वेतांबर में भिन्न मान्यताओं, और समाज-जीवन के व्यवहारिक निर्णयों से जुड़ा था।
- मुख्य विभाजन दो बड़े समूहों में हुआ: डिगंबर (Digambara) और श्वेतांबर (Svetambara)। दोनों ने महावीर के शिक्षाओं को मान preserved किया, लेकिन कुछ मान्यताओं, पन्थ-यात्राओं और साधु-समुदाय के नियमों में भिन्नता ली।
- ये भिन्नताएँ सिर्फ़ एक-आधि शास्त्रकथा नहीं थीं; वे अभ्यास-निष्ठा, आचार-व्रतों की कड़ाई, पहिरावा (जुटा-फटा वस्त्र बनाम पूर्ण वस्त्रोपयोग), मूर्तिपूजा के स्थान पर विचार, महिलाओं के मोक्ष-सत्य, और परिसंस्थागत संरचना जैसे मुद्दों पर भी थीं। उदाहरण के तौर पर:
- समय के साथ इससे कई छोटे-छोटे उपसंप्रदाय बने, जैसे अनुषंग-सम्प्रदाय (जैसे Sthanakvasi) और Terapanth, आदि—ये सब एक-दूसरे की समझ का विस्तार थे, न कि केवल विरोध। कुछ समूह मूर्तिपूजा से दूरी बनाए रखते हैं (अनादार-निर्गम), जबकि कुछ अन्य मूर्तिपूजा और तीर्थ-यात्रा के महत्व को स्वीकार करते रहे।
- साधु-समाज के नियमों में बदलाव को लेकर भी मतभेद उठे। कुछ समूहों ने अपने-अपने आचार-व्यवहार निर्धारित किए; कुछ ने संघटन और गुरुद्वारा-जटिलताओं में नई पंक्ति स्थापन की। इन सबके पीछे मूल अनुभव यही रहा: तीर्थ-मार्ग का सही साधन कौन सा है और समाज के जीवन में उसे कैसे लागू किया जाए।
संक्षेप में:
- विभाजन और विविधता का कारण कई थे—आचार-नियमों में भिन्नता, महिलाओं के मोक्ष-स्थिति से जुड़ा विचार, मूर्तिपूजा-धर्मांतरण, संन्यास-परंपरा, और संघ-निर्माण के तरीके।
- भ्रांतियाँ नहीं, बल्कि संतोषजनक विविधता की चुनौतियाँ थीं: कौन सा मार्ग शास्त्र के मुताबिक सही है, किसने किस अभ्यास को प्राथमिकता दी, और كيف समाज की जरूरतों के अनुसार संघ बना।
अगर आप चाहें, मैं Digambar बनाम Svetambar के बीच प्रमुख अंतर-संरचना (आचार-विचार, पूजन-रुझान, मोक्ष-धारणा आदि) को सरल बिंदुओं में और भी साफ-साफ समझा सकता हूँ।