Is there anything mention regarding paap sins related to masturbation, वीर्य को बहाना हस्त मैथुन के द्वारा हिंसा होती है या नहीं?
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संक्षेप में: Jain धर्म में यौन-संवरण (कामी कर्म) पर नियंत्रण बहुत मूल्यवान माना जाता है। हस्त मैथुन/स्व-यौन-सम्पर्क को लेकर कई बाते स्पष्ट हैं:
- paap/कर्म binding: सामान्यतः इसे कामील्प (यौन-संवरण) के भीतर माना जाता है और स्व-यौन-क्रिया को भी आचार्यों ने सांसारिकता(वासना) के कारण पाप के रूप में देखने की परंपरा है। इससे शरीर-मन में असंतुलन बनता है और कर्म_bundle (कर्म) जुड़ते हैं।
- गृहस्थावासियों के लिए: घर-परिवार में रहते हुए संयम, विवेक और सत्वचरित के अंतर्गत यौन-आचार-व्यवहार जरूरी है। हस्त मैथुन को आम तौर पर अनुचित कर्म माना जाता है क्योंकि यह संवेगों को बढ़ा सकता है और क्षम्य अहिंसा/आचार के विरुद्ध माना जा सकता है।
- संन्यास/ Digambara vs Shwetambara में फर्क: दोनों tradição में ब्रह्मचर्य परग्रहण की महत्ता समान है, खासकर संन्यासियों के लिए। घरेलू जीवन वाले जैन धर्मावलम्बियों के लिए भी शील/संयम की शिक्षा मजबूत है। कुछ विद्वानों के मत अलग हो सकते हैं कि यह क्रिया कितनी सीमा तक स्वीकार्य है, पर सामान्य रहने वाले आचार्यों का प्रवचनों में यह कहा गया है कि इसे जितना संभव हो रोकना उत्तम रहता है।
वीर्य-हस्त मैथुन के बारे में हिंसा का प्रश्न: Jain दर्शन में हिंसा के दायरे में दूसरे जीवों को नुकसान पहुँचना प्रमुख माना जाता है। स्व-यौन क्रिया से प्रत्यक्ष हिंसा दूसरे जीवों पर नहीं होती, परन्तु यह Sensualता (काम) को बढ़ावा दे सकती है और इससे कर्म बंधन मजबूत होते हैं। इसलिए इसे भी अनुचित/पापपूर्ण माना गया है, ताकि मन-वृत्ति शुद्ध रहे और अहिंसा के मार्ग पर स्थिरता बनी रहे।
अगर आप चाहें, मैं इस विषय पर Digambar और Shwetambar परंपराओं के ठोस शास्त्रीय उद्धरण ( arth/ 의미) के साथ सरल शब्दों में और स्पष्ट कर दूँ।