दिगंबर जैन अनन्त चतुर्दशी क्यों मनाते है
दिगंबर जैन अनन्त चतुर्दशी क्यों मनाते हैं
- यह दिगंबर जैन परंपरा में दास लक्षणा पर्व (Das Lakshanā Parva) का आख़िरी दिन है। इस 10-दिनों के पर्व में हर दिन एक प्रमुख доб्ल्व (वृहत्तर) गुण के अभ्यास पर ध्यान दिया जाता है और अंत में क्षमावाणी (Kshamāvaṇī) के साथ forgiveness का आयोजन होता है। अनंत चतुर्दशी उसी निष्कर्ष का दिन माना जाता है। इस दिन pratikraman, svādhyāya, उपवास आदि故–प्रयास बढ़ाए जाते हैं। ( jainknowledge.com)
- क्षमावाणी के दिन (आमतौर पर अनंत चतुर्दशी के एक दिन बाद) सभी जीवों से किए गए रोग/कष्ट के लिए माफ़ी माँगी जाती है और साथ ही अन्य के प्रति क्षमा भी दी जाती है। यह पवित्र अवसर है खुद को शांति व संयम की ओर खींचने का। ( jainknowledge.com)
- कुछ स्रोतों के अनुसार यह तिथि 14वें तीर्थंकर वासुपूज्या के निर्वाण/मोक्ष के संदर्भ से जुड़ी बताई जाती है, और यह भी माना जाता है कि यह पारीyुषणा (Paryushan) का अंत–स्नातक क्षमावाणी का अवसर है। (हिन्दू-दृष्टिकोण का अलग संदर्भ भी मिलते हैं, किन्तु जैन धर्म में मुख्य रूप से दिगंबर परंपरा के अनुसार समझना चाहिए।) ( en.wikipedia.org)
संक्षेप में
- अनंत चतुर्दशी= दिगंबर जैनों के Das Lakshanā Parva का आख़िरी दिन; इसके साथ क्षमावाणी/प्रत्याख्यान की तैयारी और forgiveness का महत्व बढ़ जाता है। यह आत्म-शुद्धि, तप, विनम्रता और अहिंसा के मार्ग पर पुनः टिके रहने का अवसर है। ( jainknowledge.com)
आप चाहें तो इन विषयो पर अधिक विवरण के लिए पढ़ सकते हैं: