क्षमा वाणी दिवस पर श्लोक
संक्षिप्त उत्तर:
श्लोक (खम्मामि सव्वजीवाणं…): खम्मामि सव्वजीवाणं सव्वे जीवा खमन्तु मे। मित्ति मे सव्वभूदेसु, वेरं मज्झं ण केण वि।।
मतलब (arth):
- मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ; सभी जीव मुझे क्षमा करें। मेरे मन में सब जीवों के प्रति मैत्रीभाव है और किसी के प्रति भी वैर नहीं है।
- यह वाणी (क्षमावाणी) का मूल भाव है कि क्रोध-मान-कमजोरी आदि विकारों को छोड़ कर, हर जीव के प्रति निर्मलता और क्षमाभाव रखना चाहिए।
ध्यान दें:
- क्षमावाणी पर परंपरागत महत्व दशदशर्मा के मेल से जुड़ा है और इसे पर्युषण/क्षमा-दिवस के अवसर पर किया जाता है।
- Digambar और Śvetāmbar परंपराओं में दो तटस्थ बातें मिलती हैं: Śvetāmbaras साम्वत्सरी के आख़िरी दिन मनाते हैं; Digambar इसके पहले महीनों के क्रम में क्षमावाणी मनाते हैं। फिर भी दोनों में मूल उद्देश्य—क्रोध, वैर और अहंकार को छोड़कर क्षमाभाव प्रकट करना—एक ही है।
स्पष्ट करें:
- क्षमावाणी सिर्फ क्रोध के त्याग तक सीमित न मानें; यह दशों धर्मों की आराधना से आत्मा में बनी निर्मलता के प्रभाव को वाणी में प्रकट करना है।
- यदि चाहें, मैं इस श्लोक के Digambar बनाम Śvetāmbar पाठ के संकीर्ण भिन्नार्थ भी सरल शब्दों में समझा सकता हूँ।
नोट्स:
- अगर आप चाहें तो इस विषय से जुड़ी जैनधर्म की वैदिक-स्वरूप गाथाओं के संदर्भ भी मैं सरल भाशा में दे दूँगा।
आप चाहें तो मैं इस श्लोक के अभ्यास-उद्धेश्य के लिए एक छोटी प्रैक्टिकल गाइड भी दे दूँ: कैसे प्रतिदिन क्षमावाणी का अभ्यास करें, कब बोलें, और किस तरह अपने हृदय में क्षमाभाव को गाढ़ा करें।