Vastu tatva padarto ka gyan
जैन धर्म में "वास्तु तत्त्व पदार्थों का ज्ञान" का अर्थ है—संसार में विद्यमान वस्तुओं (पदार्थों) के तत्त्व का ज्ञान। जैन दर्शन के अनुसार, संसार में छह द्रव्य (पदार्थ) माने गए हैं, जिन्हें "षट्द्रव्य" कहा जाता है। इनका वर्णन इस प्रकार है:
- जीव (आत्मा): चेतन द्रव्य, जिसमें ज्ञान, दर्शन आदि गुण होते हैं।
- अजीव: पाँच प्रकार के अचेतन द्रव्य—
- पुद्गल (पदार्थ): रूप, रस, गंध, और स्पर्श वाले कणों का समूह। - धर्म (गति का माध्यम): जीव और पुद्गल को गति देने वाला द्रव्य। - अधर्म (विश्राम का माध्यम): जीव और पुद्गल को विश्राम देने वाला द्रव्य। - आकाश (Space): जिसमें सभी द्रव्य स्थित होते हैं। - काल (समय): परिवर्तन का कारण।
इन छहों को "वास्तु" या "द्रव्य" कहा गया है। इनका गहन ज्ञान—इनकी स्वभाव, गुण, और परस्पर संबंध—को "वास्तु तत्त्व पदार्थों का ज्ञान" कहा जाता है। जैन आगमों और तत्त्वार्थ सूत्र जैसे ग्रंथों में इनका विस्तार से वर्णन मिलता है।
सारांश: जैन दर्शन के अनुसार, "वास्तु तत्त्व पदार्थों का ज्ञान" का अर्थ है इन छह द्रव्यों (जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल) के स्वरूप और उनके गुणों का ज्ञान प्राप्त करना। यही संसार और मोक्ष का मूल ज्ञान है।