जैन धर्म में जंगम तीर्थ किसे कहते हैं
जंगम तीर्थ मतलब “चलने वाला तीर्थ” या “भावतीर्थ” होता है। जैन परम्परा में तीर्थ दो प्रकार से रहते हैं:
- जंगम तीर्थ: वह सन्त, श्रावक-श्राविका आदि का संघ (चतुर्विध श्रमणसंघ) है जो वरदान, तप और साधना के द्वारा आत्मा को शुद्ध करता है। इसे असल तीर्थ माना जाता है क्योंकि साधना-संगठन ही पार लगाने वाला मार्ग है।
- स्थावर तीर्थ: वह जगहें हैं जैसे सिद्धक्षेत्र, अतिशय क्षेत्र या अन्य पवित्र भूमिें जो महापुरुषों के जीवन-कर्म से पवित्र मानी जाती हैं।
इस प्रकार जंगम तीर्थ के स्रोत में धर्म-संघ (मौला-समूह) और उनकी साधना-भूमि प्रमुख मानी जाती है, न कि सिर्फ किसी निर्जन स्थान की भौतिक पवित्रता।
Digambar और Shvetambar दुनों में यह विचार समान है: जंगम तीर्थ को आत्म-शुद्धि के मार्ग के रूप में प्रमुख माना जाता है, और स्थावर तीर्थ वही भूमि-स्थल होते हैं जहाँ महापुरुषों ने तप किया या जिनकी कृपा से तीर्थ-स्थापना हुई। कुछ ग्रंथों में इसे भावतीर्थ के रूप में भी स्पष्ट किया गया है।
अगर चाहें, मैं इस विषय पर पुरानी जैन ग्रंथों के सही शब्द (अरथ) समेत और भी स्पष्ट विवरण दे सकता हूँ।