jeev types indriya
Jainism में जीवलोक के जीव (jeev) की इंद्रियाँ दो बड़ी دستهबंदी में देखी जाती हैं:
1) ज्ञान-इंद्रियाँ (jnan-indriya) – पाँच हैं:
- नेत्र (चक्षु) – आँखों से ज्ञान/दृष्टि मिलती है
- श्रवण (श्रोत्र) – कानों से ज्ञान/सूचना मिलती है
- घ्राण (घ्राण) – नाक से गंध का ज्ञान
- रसना (रसन) – जीभ से स्वाद का ज्ञान
- स्पर्श ( sparsh) – त्वचा से स्पर्श/तत्वों का ज्ञान
2) कर्म-इंद्रियाँ (karm-indriya) – पाँच हैं (क्रिया ചെയ്യने के लिए अंग)
- हाथ (पाणि/चम्प) – कृतियों के लिए
- पैर (पद/चरण) – चलने-फिरने के लिए
- वाक् (वाचन) – बोलने के लिए
- भ्रुव/उच्चारण नहीं, बल्कि अन्य शरीरानुगत कर्म के अंग – (यहीं पर कुछ संहिताओं में दَم, तम आदि कर्मेंद्रियाँ भी गिनते हैं)
- त्वचा-तंतु/आँखों के अतिरिक्त अन्य क्रियात्मक अंग
जीवन के पाँच-संवेदी जीव (5-sense beings) वे होते हैं जिनके पास उपरोक्त ज्ञान-इंद्रियाँ और कर्म-इंद्रियाँ दोनों समान रूप से सक्रिय होती हैं—यानी मानव, बहुत-से स्तनधारी और कुछ कीड़े-झीण आदि।
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