भगवान ऋषभदेव की यशस्वती रानी से भरत महाराज का जन्म हुआ था। भगवान ने दीक्षा के लिए जाते समय भरत को साम्राज्य पद पर प्रतिष्ठित किया था। एक समय राज्यलक्ष्मी से युक्त राजर्षि भरत को एक ही साथ नीचे लिखे हुए तीन समाचार मालूम हुए थे। पूज्य पिता को केवलज्ञान उत्प
यह कथा भगवान ऋषभदेव (रिषभदेव) के पुत्र bharat Chakravarti और उनके भ्राता बाहुबली (Bahubali) की है। इसमें พंरतक शास्त्रीय बिंदु ये हैं:
- bharat ने समस्त भारत-विजय के बाद भी गर्व और बाहुबल के अहंकार से आगे बढ़कर अपने परिवार और पितृत्व के प्रति दृष्टिकोण बदला।
- दोनों भाइयों के बीच युद्ध हुआ: जलयुद्ध, दृष्टियुद्ध और मल्लयुद्ध—बाहुबली ने युद्ध में विजय प्राप्त की, पर अंततः धर्म-कल्याण और वैराग्य की राह चुनी।
- बाहुबली की तपस्या और सम्वेदना से वे दीक्षा लेकर संन्यासी बन गये; लगभग एक वर्ष का योग ध्यान किया।
- इस बीच bharat ने राज-सम्भव सुचारू रूप से जारी रखा; अंततः bharat को केवलज्ञान或 kevalajnana प्राप्त हुआ।
- कथा के अनुसार, दोनों भाइयों के भीतर से मोह-आकर्षण घटते-घटते अंततः मुक्ति और आत्म-ज्ञान की ओर मोड़ लेते हैं। यह कहानी अहिंसा, विनम्रता, दिग्विजय के साथ भी आत्म-उद्धार के संदेश को रेखांकित करती है।
Digambar बनाम Śvetāmbara पर छोटा भेद:
- दोनों परंपराओं में bharat और bahubali के जीवन के मुख्य चरण (यौद्ध-युद्ध, विराग, दीक्षा, kevala-jnana) सामान्य रूप से मिलते हैं, पर कुछ स्थानों पर कथा-विवरण और प्रतीक-चिन्ह (जैसे चक्ररत्न की भूमिका या ब्रह्मी-बहू के योगदान) में मामूली भिन्नताएं मिलती हैं। ताकि सही संदर्भ मिले, प्रत्येक परंपरा के मूल ग्रंथों के अनुसार अर्थ वही रहता है: युद्ध की पराक्रम परीक्षा के बाद उचित निर्णय और अन्ततः आत्म-ज्ञान का प्रकटन।
अगर आप चाहें तो मैं इस कथा की शुद्ध शब्दावली/पुराण-उद्धरणों के साथ आधुनिक स्थितियों में सरल arth (आर्थ) भी दे सकता हूँ, तथा Digambar और Shwetambar दोनों परंपराओं के अनुसार फर्क भी स्पष्ट कर सकता हूँ।
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