भरत और बाहुबली की कहानी आदि पुराण के अनुसार
संक्षेप में आदि पुराण के अनुसार भरत और बाहुबली की कहानी निम्न प्रकार है:
- आरम्भ में ऋषभनाथ (आदिनाथ) के दो पुत्र हुए: भरत और बाहुबली। इन दोनों भाइयों में राज्यीय संघर्ष के कारण उनका जीवन-वृत्तांत शुरु होता है।
- भरत बड़ा पुत्र था और उसने पिता के आदर्शों के अनुसार राज-शासन संभाला और चक्रवर्तिन राज के रूप में राज्य-प्रसार किया। इस भाग के भीतर आदिशिल्प और सम्राटत्व के तौर-तौर पर उसे भारत-तथ्य (भरतсар) की राजधानी- जैसी कथाओं में भी वर्णित किया गया है।
- बाहुबली उन दोनों भाइयों में दूसरे थे जिन्होंने सत्ता के आकर्षण से दूरी बनाने का निर्णय लिया। एक मोड़ पर उनके बीच क्योंकि सिंहासन के हेतु मतभेद और प्रतिद्वंद्विता का प्रसंग बना, बाहुबली ने राज-युद्ध से पहले राजपथ छोड़कर वैराग्य अपनाने का निर्णय किया।
- संसार-सुख की मोह-माया से विरक्त होकर बाहुबली ने तपस्या किया और कई वर्षों तक कठिन साधना की। अंततः उन्होंने kevala jnana (पूर्ण ज्ञान) प्राप्त किया या देर से भी वह तत्त्वज्ञ (जैन परम्परा में अध्यात्मिक उन्नति) के मार्ग पर पहुँचे, और अपने आत्म-जीवन को शुद्ध किया।
- भरत और बाहुबली की यह कथा "भरत-राज्य" और "बाहुबली की वैराग्य-गाथा" के रूप में जैन चित्त में आस्थागत रूप से उद्धृत है। भरत के शासन का प्रतीक और बाहुबली की वैराग्य-शक्ति जैनधर्म के अहिंसा, तप, और आत्म-निष्ठा के महान आदर्शों को उजागर करते हैं।
- भरत-वरष से सम्बन्ध: आदिकाल के जैन ग्रंथों में भरत को Chakravartin राज्य-राजा के रूप में वर्णित किया गया है, जिससे भारत-नामक धरती का ऐतिहासिक संगठित चिह्न बनता है। बाहुबली की कथा के माध्यम से तप, वैराग्य, और आत्म-ज्ञान का आदर्श प्रस्तुत होता है।
दिगंबर और शोएंबर परंपराओं के बीच ये घटनाक्रमों की व्याख्याओं में कुछ सूक्ष्म भिन्नताएँ पायी जाती हैं:
- कुछ जगहों पर बाहुबली के वैराग्य और आत्म-ज्ञान की यात्रा के विवरण में भिन्न-भिन्न संकेत मिलते हैं; कुछ विषयों में दोनों संप्रदाय एक ही मूल कथा को स्वीकार करते हैं, पर प्रस्तुति-रूप और दार्शनिक संकेत थोड़ा अलग होते हैं।
- सामान्यत: दोनों tradition भरत-राजा के शासन और बाहुबली की वैराग्य-यात्रा को महत्त्वपूर्ण मानते हैं, लेकिन उनके उद्देश्य, घटनाक्रम के क्रम और उपदेशों की चर्चा में कुछ पाठगत विभाजन दिखते हैं।
अगर आप चाहें, मैं इन कथाओं के मूल अंश को सरल शब्धों में पंक्तिबद्ध करके दे सकता हूँ और हर जगह Digambar बनाम Shwetambar परंपरा के अंतर को साफ-साफ बतला सकता हूँ। आप चाहेंगे कि मैं आदि पुराण से सीधे-सीधे कुछ प्रमुख श्लोक या पंक्तियाँ भी संक्षेप में प्रस्तुत करूँ?