Arihant parmatma ke pratiharya kitne hai
जैन धर्म के अनुसार, जब कोई तीर्थंकर या अरिहंत केवलज्ञान (केवलज्ञान) प्राप्त कर लेते हैं, तब उनके चारों ओर कुछ अद्भुत घटनाएँ और चमत्कारी लक्षण प्रकट होते हैं, जिन्हें "प्रातिहार्य" (प्रातिहार्य = दिव्य चमत्कार या दिव्य चिह्न) कहते हैं। अरिहंत परमात्मा के ये प्रातिहार्य उनकी दिव्यता और महानता को दर्शाते हैं।
अरिहंत परमात्मा के आठ प्रातिहार्य (अष्ट-प्रातिहार्य) माने गए हैं:
- भद्रासन (सिंहासन/सिंहासन) – दिव्य सिंहासन, जिस पर अरिहंत विराजमान होते हैं।
- चैत्यवृक्ष – अरिहंत के ऊपर एक विशाल और सुंदर वृक्ष होता है।
- चामर – दोनों ओर से चामर (झाड़ू) डुलाए जाते हैं।
- छत्र – उनके सिर के ऊपर दिव्य छत्र (छाता) रहता है।
- दिव्यध्वनि – अरिहंत के प्रवचन से दिव्यध्वनि निकलती है, जिसे सभी जीव अपनी-अपनी भाषा में समझ सकते हैं।
- पुष्पवृष्टि – देवताओं द्वारा पुष्पवृष्टि (फूलों की वर्षा) की जाती है।
- गंधोदक – सुगंधित जल की वर्षा होती है।
- दुन्दुभि – आकाश में दिव्य दुन्दुभि (नगाड़ा/ड्रम) बजता है।
इन आठ प्रातिहार्यों का उल्लेख जैन शास्त्रों में मिलता है और ये अरिहंत परमात्मा की दिव्यता तथा उनके केवलज्ञान की स्थिति को दर्शाते हैं।