स्थवीर के प्रकार
स्थवीर (Sthavira) शब्द से आम तौर पर Jainism में एक पुरानी/जवान परंपरा या संप्रदाय की ओर इशारा किया जाता है। इसे शिक्षा-चाल के हिसाब से कुछ प्रमुख उप-धाराओं से जोड़ा जाता है जो Śvetāmbara संप्रदाय के भीतर आज भी पाई जाती हैं। प्रमुख प्रकार (संप्रदाय/अब्द्धियों) इस प्रकार बताई जाती हैं:
- स्थाणकवासी (Sthanakvāsī): Śvetāmbara जगत की एक प्रमुख उपशाखा है जो मूर्ति-पूजा के बजाय ध्यान-योग और मंदिर-निर्माण के बिना साधना पर अधिक जोर देती है। उनका धार्मिक जीवन थोड़ा सरल और मौलिक है, और वे तीर्थंकरों के पवित्र जीवन के आदर्श को ध्यानकेंद्र बनाते हैं।
- तेऱापंथी (Terapanth): Śvetāmbara में एक दूसरी प्रमुख चुनी हुई परंपरा है, जिसकी स्थापना 15वीं सदी के अंत में आचार्य संजय distrikt (आचार्य समिति) ने की। यह समूह कठोर आचार-विचार, संयम, अनुशासन, और गुरु-परम्परा के स्पष्ट ढांचे के लिए जाना जाता है। वे मूर्ति-पूजा के पारंपरिक रीति-रिवाजों को भी स्वीकार करते हैं, पर अपने संगठनात्मक ढांचे और साधना पद्धति के लिए प्रसिद्ध हैं।
- अन्य छोटे/स्थानीय उपसम्प्रदाय भी मिलते हैं, जो क्षेत्रीय परंपराओं या गुरु-परम्पराओं के कारण बन गए हैं—पर इनमें स्थाणकवासी और तेऱापंथी जैसी बड़ी पहचान सामान्य रूप से मान्य मानी जाती हैं।
महत्वपूर्ण बातें:
- स्थवीर/स्थवीरlike शब्द Jain धर्म के भीतर एक प्रकार की ऐतिहासिक-आधार परिभाषा है; आज के समय में यह अक्सर Śvetāmbara के भीतर अलग-अलग संप्रदायों के संदर्भ में सूचीबद्ध होता है।
- Digambara बनाम Śvetāmbara के बीच कोई “स्थवीर” उप-घटना Digambara में नहीं मिलती; यह नाम अधिकतर Śvetāmbara के भीतर के विभाजन से जुड़ा है।
अगर आप चाहें, मैं इनमें से किसी एक संप्रदाय के आधिकारिक उप-वर्णन, पूजन-पद्धति, आचार-विचार आदि को सीधे स्रोत के शब्दों में भी दे सकता हूँ।