सात नरकों से निकालकर जीव कहां-कहां उत्पन्न होते हैं
संक्षिप्त उत्तर:
- सात नरक (नरक-लोक) से निकलकर जीव फिर अपनी Karma के अनुसार ऊपर के लोकों में जन्म लेते हैं—या तो मानव लोक (मध्यम लोक) में जन्म होता है, या ऊँचे देव-लोकों में। इन सबमें जन्म-ओं का निर्धारण उनके बिलीनी (कर्म) के परिणामों से होता है। अंत में जब सभी नकारात्मक कर्म पूरी तरह प्रभावी नहीं रहते और सकारात्मक कर्म भी मिलकर पूरा हो जाते हैं, तब जीव मोक्ष पाकर सिद्ध-लौक Siddhashila में मुक्त हो सकता है। ( jainknowledge.com)
विस्तार (सरल रूप में):
- न्यायसंगत दृश्यता: Jain cosmology में पृथ्वी के नीचे सात नरक रहते हैं ( Ratna-prabha, Sharkara-prabha, Valuka-prabha, Panka-prabha, Dhuma-prabha, Tamaḥ/prabha, Mahā-tamaḥ-prabha ). ये नरक सदा-स्थायी नहीं होते; कर्म phal पूरी होने पर जीव फिर किसी ऊँचे लोक में जन्म ले लेते हैं। ( jainknowledge.com)
- ऊपर के लोक (उर्द्व-लोक) और मध्य लोक (मध्या-लोक): मध्य लोक यानी मानव-लोक (जंबुड्विप) मुख्य स्थान है जहाँ से जीवन संस्कार और कर्म का परिणाम निकलता है; उर्द्व-लोक में देव-लोक रहते हैं। इससे अगले जन्मों का मार्ग तय होता है। ( jainpedia.org)
- मोक्ष: जब सारे karmic bondage से मुक्त हो जाता है, तब आत्मा सिद्ध-लोक Siddhashila में निर्वाण पाकर मोक्ष को प्राप्त करती है। ( jainpedia.org)
याद रखने योग्य बिंदु:
- इतिहास-धारणा में नरकों के नाम और संरचना समविंशय (Śvetāmbara) और दिगंबर परंपराओं के कुछ पाठों में थोड़ा-बहुत भिन्न हो सकता है, लेकिन मूल विचार यही है कि नरक से निकलकर आत्मा ऊपर के लोकों में जन्म लेती है और अंततः मोक्ष को प्राप्त कर सकती है। ( jainpedia.org)
कृपया ध्यान दें:
- यदि आप चाहें, मैं इन विचारों के लिए मूल श्लок या अधिक विशिष्ट उद्धरण भी दे सकता हूँ—पर अभी संक्षिप्त और स्पष्ट जवाब यही है।