Pani dwara punya karam kar kisne karam bandh kiya
जैन धर्म में पानी या किसी बाहरी पदार्थ से तुम्हारे पाप-करण नहीं रुकते हैं। कर्म बाँधना तुम्हारे अपने कर्मों पर निर्भर है—यानी तुम्हारे विचार, वाणी और कर्म कैसे होते हैं, इसका प्रभाव Karma पर पड़ता है।
कर्म कैसे रुकते/घटते हैं (सरल सार):
- पांच मूल उपवास-आचरण भी पुण्य-करण पर असर डालते हैं (यदि आप गृहस्थ हो तो तीन सम्यक और नैतिक आचरणों पर चलें; यदि सम्पन साधु-संघ हो तो अधिक कठोर तप-तपस्या अपनाते हैं)।
- “सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन, सम्यक आचार” (तीन विजय) को धारणा और सही आचरण के मार्ग से जीवन भर अपनाने पर ही कर्म धीरे-धीरे घटते हैं।
- अंततः आत्मा स्वयं ही अपने संस्कारों को साफ करता है—कर्मों को वश में करना और नये कर्मों से मुक्त होना आत्मा के पतझड़/शुद्धिकरण से होता है; टीर्थंकर द्वारा दिखाये गये मार्गों (जैन मार्ग) के अनुसार सही ज्ञान, शुद्ध आचार और प्रेमभरी जीवनशैली निभानी होती है।
- बाहरी आध्यात्मिक हस्तक्षेप (जैसे पानी आदि) कर्मों को रोक नहीं सकता; यह मुख्यतः व्यक्ति के अपने पवित्र आचरण और तप से संभव है। टीर्थंकर महावीर आदि ने यही मार्ग बताए हैं।
ध्यान रखें:
- Digambar और Shwetambar के भीतर कुछ स्थापनाओं में मतभेद हो सकते हैं, विशेषकर साधना सामग्री और कुछ श्रद्धा-विश्वास के पक्षों में; पर कर्म-बंधन और कर्म-त्याग का मूल सिद्धांत दोनों ओर समान है: आत्मा का स्व-शुद्धि ही मुक्तिकारक मार्ग है।
अगर आप चाहें, मैं आपके प्रश्न को विस्तृत रूप से ( Digambar और Shwetambar के मतानुसार अलग- अलग व्याख्या सहित) सरल भाषा में समझा दूँगा।