Jiji visa Ka Ant kya hai
"Jiji visa" (जीजीविषा) का अर्थ है – जीने की इच्छा या जीवन जीने की तीव्र आकांक्षा। जैन दर्शन के अनुसार, प्रत्येक जीव में स्वयं के अस्तित्व को बनाए रखने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है, जिसे जीजीविषा कहा जाता है। यह प्रवृत्ति सभी प्राणियों में पाई जाती है—चाहे वे एकेन्द्रिय (एकेंद्रिय) हों या पंचेन्द्रिय (पंचेंद्रिय)।
जैन सिद्धांत के अनुसार "जीजीविषा" का अंत कब होता है:
जीजीविषा का वास्तविक अंत तभी होता है जब आत्मा पूरी तरह से कर्म बंधनों से मुक्त हो जाती है, अर्थात् जब मोक्ष की प्राप्ति होती है। मोक्ष की अवस्था में आत्मा जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाती है; वहाँ न तो जन्म होता है, न मृत्यु, न सुख-दुःख, न राग-द्वेष और न ही जीने की इच्छा या जीजीविषा। मोक्ष प्राप्त आत्मा केवल शुद्ध, अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत शक्ति में स्थित रहती है।
संक्षेप में: जीजीविषा का अंत मोक्ष की प्राप्ति के साथ होता है। जब आत्मा कर्मों से मुक्त होकर सिद्ध अवस्था को प्राप्त कर लेती है, तब उसमें जीने की इच्छा भी नहीं रहती, क्योंकि वहाँ शाश्वत शांति और आनंद होता है।
संदर्भ:
- तत्त्वार्थ सूत्र
- समण सुत्तं
- जैन दर्शन (आचार्य उमास्वामी)