लक्षपटल तेलमयम् दानम् या दत्तवती सती । सा पुष्पचूला पुण्येना, ज्ञायते लोके विख्याता ॥ --- explain
मंदार बात यह है कि यह श्लोक दान-धर्म की महिमा का वर्णन करता है।
संस्कृत पाठ का सरल अर्थ:
- लक्षपटल तेलमयम् दानम्: “लक्ष-पटल” (एक विशाल मात्रा का संकेत; बहुत बड़ा) के साथ तेल-भरा दीप दान करना। यहाँ दीप-दान को अत्यंत पुण्यकारक बताया गया है; तेल द्वारा दीप जलाने का कर्म अज्ञान के अंधकार को दूर कर प्रकाश फैलाने जैसा प्रतीक है।
- या दत्तवती सती: “या दत्तवती सती”—जो विदुषी/धार्मिक रूप से प्रत्यक्ष दान-प्रक्रिया करने वाली स्त्री है। यानी ऐसी स्त्री का दान-कार्य विशेष पुण्य देता है।
- सा पुष्पचूला पुण्येना: “वह पुष्पचूला (फूल-चूड़ा) पुण्य से परिपूर्ण है”—यानी वह दान-कार्य के कारण पुण्य-प्रीत है, उसका पुण्य-फल अभिमत है।
- ज्ञायते लोके विख्याता: “यह संसार में प्रसिद्ध/विख्यात माना जाता है”—उस दान के कारण उसका नाम जगत में जाना जाता है।
धार्मिक अर्थ (जैन धरोहर के अनुरूप सरल व्याख्या):
- दान का सार: दान-धर्म का मूल उद्देश्य अर्हत्ता-मेधावी बनना है—अर्थात दान से भ्रांति/अहंकार घटता है और आत्म-शुद्धि, सहज-सम्पन्नता बढ़ती है।
- दीप का प्रतीक: दीप-दान अंधकार (अज्ञान) और दुःखों से मुक्त होने की प्रेरणा देता है; तेल-भरी दीप से आत्मा के प्रकाश का प्रतीक बने।
- स्त्री का दान: यदि यह स्त्री दान करती है, तो उसका पुण्य-वर्णन संसार में प्रसिद्ध होता है—जैन क्षांतिकोप-धर्म में दान का प्रभाव स्थायी माना गया है।
- सामाजिक प्रभाव: ऐसे पुण्य-कार्य से समाज में सत्कर्म-प्रेरणा बढ़ती है, और दायित्व-पालन की भी शिक्ष दी जाती है।
संस्कृत पाठ पर दो मान्यताएं (Digambara बनाम Śvetāmbara traditions):
- दोनों परंपराओं में दान-धर्म को प्रमुख माना गया है; दीप-दान व पुष्प-चूला जैसे प्रतीक अज्ञान-निवारण और सज्जनता की विचारधारा से जुड़ते हैं।
- ग्रंथानुसार शब्दों के खास अर्थ में सूक्ष्म भेद हो सकता है, पर मूख्य संदेश—“दान से पुण्य होता है और उसका प्रभाव संसार में प्रसिद्ध होता है”—समान रहता है।
यदि आप चाहें, मैं इस श्लोक की शुद्ध, स्रोत-आधारित artha (अर्थ) और Digambar/Śvetāmbara दोनों प्रवृत्तियों के अलग-अलग भाव-व्याख्या के साथ विस्तार से समझा दूं।