Sadhu ke liye – Yahi Dharm
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जैन धर्म में साधु (मुनि) के लिए "यही धर्म" का अर्थ उनके लिए निर्धारित कड़े आचार और धर्म के पालन से है। साधु के लिए प्रमुख धर्मों में पाँच महाव्रत (पाँच मुख्य व्रत) का पालन करना अत्यंत आवश्यक है:
- अहिंसा (अहिंसा महाव्रत) – किसी भी जीव को मन, वचन और कर्म से हानि न पहुँचाना।
- सत्य (सत्य महाव्रत) – सदैव सत्य बोलना, किसी भी प्रकार का झूठ, छल या कपट न करना।
- अस्तेय (अचौर्य महाव्रत) – बिना अनुमति किसी भी वस्तु का ग्रहण न करना।
- ब्रह्मचर्य (ब्रह्मचर्य महाव्रत) – पूर्ण रूप से ब्रह्मचर्य का पालन करना, काम-वासना से दूर रहना।
- अपरिग्रह (अपरिग्रह महाव्रत) – किसी भी प्रकार का संग्रह या आसक्ति न रखना, केवल आवश्यक वस्तुओं का ही उपयोग करना।
इसके अतिरिक्त, साधु के लिए निम्नलिखित आचरण भी धर्म का ही अंग हैं:
- संयम, तप, स्वाध्याय (धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन)
- क्षमा, विनय, मैत्रीभाव
- ध्यान और आत्मचिंतन
- लोककल्याण की भावना
निष्कर्ष: साधु के लिए "यही धर्म" का अर्थ है – उपरोक्त महाव्रतों और संयमित जीवन का कड़ाई से पालन, आत्मशुद्धि और मोक्ष की ओर अग्रसर होना। यही उनका परम धर्म है।