Prati lekhan करते-करते kevali bane
जी हाँ, जैन आगमों के अनुसार "प्रति लेखन" (अर्थात् अपने पापों का बार-बार आत्म-विश्लेषण, लेखा-जोखा और प्रायश्चित करना) एक बहुत ही महत्वपूर्ण साधना मानी गई है। यह साधना आत्म-शुद्धि, आत्म-निरीक्षण और संकल्प के लिए की जाती है।
कहा जाता है कि बहुत से साधकों ने निरंतर प्रति लेखन, आत्म-निंदा, प्रायश्चित और सम्यक् अभ्यास के द्वारा अपने कर्मों का क्षय किया और अंततः केवल ज्ञान (केवलज्ञान) को प्राप्त किया। प्रति लेखन के माध्यम से आत्मा पर लगे पाप कर्म कम होते हैं और शुद्धता आती है, जिससे आत्मा केवलज्ञान के योग्य बनती है।
जैन आगमों में कई उदाहरण मिलते हैं, जिनमें मुनिराजों ने नियमित प्रति लेखन, आलोचना, प्रायश्चित आदि के माध्यम से केवली पद प्राप्त किया।
उदाहरण:
- भगवान महावीर स्वामी स्वयं आत्म-निरीक्षण एवं प्रति लेखन की अत्यंत महत्ता बताते हैं।
- ‘उत्तम क्षमा’ धर्म के पालन हेतु भी प्रति लेखन आवश्यक माना गया है।
सारांश: प्रति लेखन एक महान साधना है। इसके सतत अभ्यास से साधक अपने पाप पदों को दूर कर केवलज्ञान प्राप्त कर सकता है, जैसा कि जैन शास्त्रों में उल्लेखित है।