Jain pakshal pooja se karma ki nirjara hoti hai
संक्षेप में जवाब: पूजा-उपासना (pakshal pooja) से कर्म की निर्जरा एक सीधा नियम नहीं है, बल्कि यह साधना का केवल एक प्रेरक तत्व हो सकता है। निर्वाणमार्ग में कर्मों की निर्जरा अधिकतर आचार-व्रत, तप, नम्रता, क्षमा, क्षेत्र-परिहार (हिंसा-परहेज़), सुमन-चित्त (निष्ठा) आदि सही आचार-व्यवहार से होती है। भाव-शुद्धि और आत्म-नियमन से ही कर्मों के बांध घटते हैं।
तभी कहा जा सकता है कि:
- भक्तिपूर्ण पूजा/उपासना से मन में संयम, संकल्प और तपा-त्याग की भावना बढ़ती है, जो कर्म-निर्जरा के कदमों को समर्थ बनाती है।
- परंपरा में तिर्थंकर, सम्राट, या इष्ट की पूजा-स्मरण कभी-कभी प्रेरणा देती है ताकि व्यक्ति अपने आचरण को अधिक शुद्ध कर सके; लेकिन यह अपने-आप में आत्म-शुद्धि का साधन नहीं बनती है अगर आचार-व्यवहार नहीं बदला जा रहा हो।
- जन्म-सम्पन्न कर्मों को समाप्त करना विशेष तपस्या, व्रत, ब्रह्मचर्य, संयम-उपाय आदि कठोर साधना मांगते हैं; पूजा केवल प्रेरणा और मनोबल देने वाला एक भाग हो सकता है।
अगर आप चाहें, मैं जैन धर्मग्रंथों के अनुसार पूजा-उपासना, पवित्र स्मरण और निर्जरा के संबंध में अधिक स्प्ष्ट वर्णन साझा कर दूँ।