Prati lekhan Karke Karke Kaun kevali
प्रति लेखन (prati lekhan) का संबंध जैन धर्म में आत्म-परिक्षण और आत्म-निरीक्षण से है, जिसमें साधक अपने दोषों, पापों और त्रुटियों को लिखकर उनका प्रायश्चित करता है।
"प्रति लेखन करके कौन केवलि?" — इस प्रश्न का उत्तर है: श्री श्रीमद् आदिनाथ भगवान (ऋषभदेव) के पुत्र मरुदेव (मरुदेवी माताजी) ने प्रति लेखन साधना द्वारा ही केवलज्ञान की प्राप्ति की थी।
जैन आगमों के अनुसार, मरुदेवी माताजी ने आत्म-निरीक्षण और प्रति लेखन क्रिया के माध्यम से अपने कर्मों का नाश किया और वे स्त्री शरीर में रहते हुए केवलज्ञान (केवलज्ञान) को प्राप्त करने वाली प्रथम स्त्री बनीं।
इसलिए, मरुदेवी माताजी प्रति लेखन साधना द्वारा केवलि (केवलज्ञानी) बनी थीं।