Kya devi devta hote hain Jain Dharm ke anusar?
छात्रवृत्ति के अनुसार Jain Dharma में देवी-देवता (devas) को सृष्टिकर्ता नहीं माना जाता। वे एक-दूसरे से और जीव-जगत से अलग एक ऊँचे स्थान पर जन्म लेने वाले जिव हैं, पर उनकी मोह-माया या आराधना moksha के लिए निर्णायक नहीं है।
मुख्य बातें:
- Jainism में परम सत्य: “काय-क्रिया-धर्म” के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करना। इसके लिए आत्म-ज्ञान (Kevala Jnana) और सही आचार-व्यवहार जरूरी माना जाता है; देवी-देवता मोक्ष के लिए मार्गदर्शक या कर्ता नहीं हैं.
- देवताओं की भूमिका: धर्म-संस्कार के ठहराव के समय देवी-देवता (devas) को ऊँची दुनिया में रहने वाले जीव माना जाता है, पर वे सृष्टि-निर्माता नहीं हैं, और उनके पSupport से ही मोक्ष नहीं मिलता।
- अन्यथा कथन (यद्-यद्) कुछ परंपराओं में यक्ष-यक्षिणी आदि को ऐश्वर्य-रक्षक के रूप में पूजा-आराधना की परंपरा हो सकती है, लेकिन यह भी मोक्ष की गारंटी नहीं देती और वे प्रधान शक्ति नहीं माने जाते।
- Digambar बनाम Shwetambar में भिन्न-भिन्न मत: दोनों क्षेत्रों में सभ्यता-चर्चा में देव-देवताओं की भिन्न व्याख्या हो सकती है, पर मूल शिक्षाओं (मोक्ष, त्रिरत्न, आचार-विचार) में देवी-देवताओं को सृष्टिकर्ता या मोक्ष के मार्गदर्शक के रूप में मान्यता समान नहीं रहती; प्रमुख उद्देश्य आत्म-शुद्धि और प्रेरणा है, न कि देवताओं की पूजा।
यदि आप चाहें, मैं इस विषय पर संदर्भित Jain शास्त्रों के श्लोक-भाषा और उसका शुद्ध arth बता सकता हूँ (Digambar और Śvetāmbara के अनुसार भिन्न अर्थ भी स्पष्ट कर दूँगा)।