Sachit gochri kisne behrai
जैन धर्म के अनुसार "सचित गोचरी" का अर्थ है – वह आहार या वस्तु जिसमें जीवन (सचित) होता है, जैसे फल, सब्ज़ियाँ, पत्तियाँ आदि। जैन साधुओं के लिए आहार ग्रहण करते समय "असचित" (निर्जीव) गोचरी को ही ग्रहण करना उत्तम माना गया है।
"सचित गोचरी किसने बह्राई?" — इस प्रश्न का उत्तर है: जैन आगमों के अनुसार, भगवान महावीर स्वामी ने आहार चर्या में विशेष सावधानी रखी थी और उन्होंने "सचित गोचरी" (जिसमें जीवन हो) का त्याग किया था। जैन साधु-साध्वियाँ भी आहार ग्रहण करते समय सचित गोचरी नहीं लेते, केवल असचित (निर्जीव) वस्तुओं को ही लेते हैं।
इसलिए, जैन परंपरा में "सचित गोचरी" को ग्रहण करना वर्जित (निषिद्ध) है, और इसका त्याग जैन साधुओं द्वारा किया गया है।