गणधर वलय स्त्रोत पूरा बताओं
गणधर वलय स्तोत्र (Shri Gandhar Valay Stotram) जैन धर्म में गणधर देवों के गुणों का स्तवन करता है। नीचे मूल पाठ और उसका सरल अर्थ दिया गया है। ध्यान दें कि Digambar और Shwetambar समुदायों में पाठ-संस्करणों में कभी-कभी शब्दभेद हो सकता है; नीचे जो संस्करण सामान्य रूप से उद्धृत होता है वही प्रस्तुत है।
मूल पाठ (शुरुआती भाग): 1) जिनान् जिताराति-गणान् गरिष्ठान्, देशावधीन् सर्वपरावधींश्च। सत्कोष्ठबीजादि-पदानुसारीन्, स्तुवे गणیشानपि तद्गुणाप्त्यै॥
2) संभिन्न-श्रोत्रान्वित-sन्मुनीन्द्रान् प्रत्येक-सम्बोधित-बुद्धधर्मान्। स्वयं प्रबुद्धांश्च विमुक्तिमार्गान् स्तुवे गणेशानपि तद्गुणाप्त्यै॥
3) द्विधा मन:पर्यय-चित्प्रयुक्तान् द्वि-पञ्च-सप्त-dvyपूर्वसक्तान्। अष्टाङ्ग-नैमित्तिक-शादक्षान् स्तुवे गणधर के तद्गुणाप्त्यै॥
4) नृसुर-खचर-सेव्या विश्व-श्रेष्ठर्द्धि-भूषा विविध-गुणसमुद्रा मारमातङ्ग-सिंहाः । भव-जल-निधि-पोता वन्दिता मे दिशन्तु मुनि-गण-सकला: श्रीसिद्धिदाः सदृषीन्द्रा: ॥
अर्थ (संक्षेप में):
- मैं उन गणधर गणों की श्रेष्ठियों को नमस्कार करता हूँ, जो जिनेंद्र (आदि तीर्थंकर) के गुणों के सार हैं, और सभी दिशाओं के भीतर और परमावधि ज्ञान के धारणकर्ता हैं।
- मैं उन संप्रभेद-श्रवणों, समुुपद मुनियों, और बुद्धिमान तीर्थंकर-गणों के समस्त गुणों का स्तवन करता हूँ।
- मैं उन लक्ष्यों के लिए जिनेन्द्र गणधर के गुण-प्राप्ति का अनुरोध करता हूँ।
- गणधर देवों की वीरता, साधु-गणों की शुद्धता, और दिव्य प्रभु-रिद्धि-सम्पन्नता का गुण-पूरण मैं नमन करता हूँ।
पूर्ण पाठ का संदर्भ-पूर्वक पढ़ना और सही अर्थ जानना:
- पाठ-संस्करण और शब्द-समृद्धि समुदाय-आधार पर थोड़ा भिन्न हो सकता है, इसलिए अपने समुदाय के गुरुद्वारा/पाठ-सम्मेलन से मिलती-जुलती पाठ-संस्कृति देखना जरूरी है।
- अगर आप Digambar बनाम Shwetambar के समरूप-भिन्न पाठों के भी स्पष्ट संस्करण चाहते हैं, तो मैं उनके द्वारा मान्य व्याख्या (arth) प्रस्तुत कर सकता हूँ।
यदि आप चाहें तो मैं इस स्तोत्र के और श्लोक (पूरा पाठ) को आपके साथ क्रमवार दे दूँ और हर भाग का अर्थ स्पष्ट कर दूँ। साथ ही Digambar और Shwetambar दोनों धाराओं के अनुसार संभावित भिन्नताओं को भी स्पष्ट कर दूँ।