- महावीरजी ने अपने अंतिम समय में Pavapuri (Magadha) में 48 घंटे तक निरन्तर प्रवचन दिया। यह प्रवचन उत्तराध्यान (Uttarādhyāyana Sutra) के रूप में दर्ज है। Śvetāmbara और Digambara दोनों परंपराओं में इसे अंतिम शिक्षा माना जाता है, पर ठहराव और dating में कुछ अंतर दिखते हैं (Śvetāmbara सामान्यतः 527 BCE मानते हैं; Digambara के उल्लेख कभी-कभी अलग काल-निर्देश दे देते हैं). (
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- प्रवचन का मूल विषय: कर्म के फलों के बारे में विस्तृत विवरण और नीतिपरक शिक्षाएं ताकि जीव मोक्ष के पथ पर चल सके। इसमें महावीर ने कर्म के शुभ-प्रयास (auspicious) और अशुभ (inauspicious) कर्मों के परिणामों को 55-55 अध्यायों में स्पष्ट किया। साथ ही कुछ रामबाण उपदेश भी दिए जिनमें सही आस्तिक्य, सही ज्ञान, सही आचरण आदि विचारों की दिशा भी मिलती है। (
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- nirvāṇa (मोक्ष) की कथा: इन 48 Prahars के बाद महावीर ने निर्वाण प्राप्त किया, Pavapuri के निकट Jal mandir के संदर्भ में सम्यक स्मरण और योग-निरोध के दौरान शरीर छोड़ा। यह कहानी Kalpasutra और अन्य परंपराओं में भी वर्णित है। (
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- मुख्य शिक्षाएं (संक्षेप में)
- कर्म-धर्म की गूढ़ता: जीवन-मृत्यु के चक्र के पीछे कर्मों का परिणाम है; शुभ karma करने से मुक्तिपथ सरल होता है, अशुभ कर्मों से bondage बढ़ता है। प्रवचन में इन karmic परिणामों को विस्तृत रूप से समझाया गया है। (
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- dharma और मोक्ष: धर्म के मार्ग पर चलना ही मोक्ष का मार्ग है; अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह आदि के व्यवहारिक उपदेश बार-बार 강조 होते हैं। (
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- अने Kantavada (Nayavada) और संयम: एकाधिक दृष्टिकोणों की संभावना को मान्यता देना, साथ ही विविध सत्य की अनुभूति के बीच संतुलन बनाये रखना (अनेकान्तवाद के ढांचे के संकेत इन आख्यानों में मिलते हैं; पाठ के हिस्से में अन्तर्निहित विचारधारा का उल्लेख मिलता है)। (
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- सही मार्ग के त्रिगुण (三) — सत्य, ज्ञान, आचरण: महावीर ने इस समुच्चय की महत्ता पर बल दिया है, ताकि व्यक्ति सही आत्म-उन्नति कर सके। यह प्रवचन की धारा से जुड़ा धारणा है। (
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- दो परंपराओं के बीच मुख्य भिन्नताएं (संक्षेप में)
- dating/तिथि: Śvetāmbara कहते हैं कि nirvāṇa 527 BCE के आसपास हुआ; Digambara में कुछ अन्य (कम/अधूरा) वर्षों के उल्लेख मिलते हैं, पर Pavapuri में निर्वाण और ज्ञान-परायणता का प्रमाण सभी परंपराओं में समान है। (
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- पाठ-उल्लेख: अंतिम deshna ( antim deshna/Uttarādhyāyana) को लेकर विवरणों में संकेतन-व्याकरण और पाठ-स्थितियाँ थोड़ा भिन्न हो सकती हैं, पर मूल सिद्धांत और 48-hour Maha-vachan का विचार सभी में समान है। (
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- प्रयोगिक जानकारी (संक्षिप्त)
- प्रवचन कितने घंटे/प्रहार: 48 ghadi (16 prahars) के बराबर, लगभग 48 घंटे लगातार। यह उत्तराध्यान Sutra में दर्ज है और 55 अध्यायों में शुभ कर्मों के परिणाम, 55 अध्यायों में अशुभ कर्मों के परिणाम बताए गए हैं (ऐतिहासिक रेखा में इसे अंतिम पुस्तिका मानते हैं)। (
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- मोक्ष कहाँ और कैसे: Pavapuri में निर्वाण, योग-निरोध द्वारा मन-वाक्-क्रिया पर संयम; अंत में Siddhashila की ओर आत्मा की उन्नति। (
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- अगर आप मूल पाठ (आधिकारिक श्लोक/अध्याय) देखना चाहें
- उत्तराध्याय-निष्ठ उत्तरध्यान के संकलन और 55+55 संरचना जैसी जानकारी के साथ, मूल संदर्भ और पाठ के अंश प्रामाणिक ग्रंथों में मिलते हैं। आप चाहें तो मैं यूपीतराध्यान Sutra के संकलन/अनुवाद से जुड़ी सरल व्याख्या दे दूं या Digambar और Śvetāmbara परंपराओं के शब्द-संयोजन के कुछ उद्धरण दे सकता/सकती हूँ।
- आप चाहें तो मैं इन शिक्षाओं का एक सरल, आत्म-उन्मुख सार भी दे दूं:
- कर्म से निर्भरता कम करिए, अहिंसा और सत्य का अभ्यास बढ़ाइए, हर समय सच-ज्ञान-आचरण की मर्यादा निभाइए, और अनेकेन्द्रित दृष्टिकोण को समझकर अपने जीवन को मोक्षक-path पर ढालिए।
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