उपाध्याय यशोविजयजी म.सा. द्वारा रचित अष्टक?
उपाध्याय यशोविजयजी म.सा. ने अनेक ग्रंथों की रचना की है, जिनमें "अष्टक" बहुत प्रसिद्ध है। यशोविजयजी कृत "अष्टक" दरअसल 'यशोविजय अष्टक' या 'यशोविजयजी नुं अष्टक' के नाम से जाना जाता है। यह आठ श्लोकों में रचित एक स्तुति है, जिसमें वे ज्ञान, दर्शन, चरित्र, तप, क्षमा, सरलता, संयम आदि गुणों का वर्णन करते हैं। यह अष्टक साधकों में वैराग्य, संयम और आत्मानुभूति की भावना जगाने के लिए रचा गया है।
यशोविजयजी का अष्टक संस्कृत/गुजराती/हिन्दी में मिलता है। इसके उदाहरण स्वरूप पहले श्लोक का हिन्दी भावार्थ इस प्रकार है:
पहला श्लोक: "जिन शासन राखे जिणे, छे आमे जिण जीवन। जिणे जिण शासन राख्यो, तेनो छे जिण जीवन।"
भावार्थ: जिन्होंने जिन शासन (अर्थात् जैन धर्म) को कायम रखा है, वही वास्तव में जीवन जीते हैं। और जिन्होंने जिन शासन को कायम नहीं रखा, उनका जीवन व्यर्थ है।
अष्टक के सभी श्लोकों में आत्मा की शुद्धि, संयम, वैराग्य, और जिन शासन की महिमा का वर्णन है। यह अष्टक जैन साधकों में अत्यंत लोकप्रिय है और प्रायः धार्मिक आयोजनों में इसका पाठ किया जाता है।
यदि आपको पूरे अष्टक के श्लोक चाहिए या उसका विशेष अर्थ जानना है, तो कृपया बताएं।