जैन धर्म में प्रयूषन पर्व का अर्थ
24
जैन धर्म में प्रयुष्यन/पार्युषण पर्व का अर्थ
- प्रयुष्यन/paryushan/paryushan parva वर्षा ऋतु (मानसून) के समय होने वाला प्रमुख धर्म–आध्यात्मिक उत्सव है। वर्षाकाल में साधक-साध्वियों को आचरण, विचार, और तप में अधिक गहराई से जुटने का अवसर मिलता है। इसका मूल भाव तप-परिशुद्धि, विवेक-वर्धन और क्षमा-भाव को बढ़ावा देना है।
- शब्दार्थ: पार्युषण का शाब्दिक अर्थ है वर्षा-काल में विश्राम/रुकना या उसी समय के लिए ठहरना। इसका संकेत है कि इस समय मन, वचन, कर्म की शुद्धि के लिए अधिक समय देना, आत्म-आलोचना और आत्म-संयम की प्रथा मजबूत करना।
- मुख्य दैनंदिन क्रियाकलाप (आचार–पद्धति):
- Digambar बनाम Shwetambar में भिन्नताएं:
यदि आप चाहें, मैं खासकर आपके संप्रदाय (Digambar/Shwetambar) के अनुसार प्रयुष्यन के अभ्यासों की संक्षिप्त मार्गदर्शिका भी दे सकता/सकती हूँ।