एक दिन में चार हत्या करने वाला भी प्रायश्चित करने से कहाँ गया ?
जैन धर्म के अनुसार, किसी भी प्रकार की हिंसा (हत्या भी) पाप है, और यह जीव को बंधन में डालती है। यदि किसी ने जाने-अनजाने में भी हिंसा कर दी हो, तो उसके प्रायश्चित के लिए जैन आगमों में विस्तार से बताया गया है। प्रायश्चित (penance) से व्यक्ति अपने पापों का प्रायश्चित कर सकता है, लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि वह सच्चे हृदय से पश्चाताप करे, भविष्य में ऐसा न करने का संकल्प ले, और जितना संभव हो, अहिंसा का पालन करे।
अगम ग्रंथों के अनुसार, महाप्रायश्चित, अल्पप्रायश्चित, और अन्य कई प्रकार के प्रायश्चित बताए गए हैं। यदि कोई व्यक्ति गंभीर पाप (जैसे हत्या) करता है, तो उसे गुरु या आचार्य के पास जाकर अपने पाप को स्वीकारना चाहिए और उनके द्वारा बताए गए प्रायश्चित का पालन करना चाहिए। प्रायश्चित करने से पाप के बंधन में कमी आती है, और आत्मा की शुद्धि होती है।
परंतु, जैन दर्शन में यह भी कहा गया है कि कर्म का फल अवश्य मिलता है। प्रायश्चित से कर्म का भार हल्का तो हो सकता है, परंतु पूर्णतः नष्ट नहीं हो सकता जब तक कि उसका संपूर्ण प्रायश्चित और आत्म-शुद्धि न हो जाए।
इसलिए, यदि किसी ने एक दिन में चार हत्याएँ कीं, और उसने सच्चे हृदय से प्रायश्चित किया, तो वह आत्मा कर्मों के बंधन से मुक्त होने के मार्ग पर आ सकती है, परंतु उसे अपने कर्मों का फल किसी न किसी रूप में भुगतना पड़ेगा। प्रायश्चित से उसे आगे के जन्मों में मुक्ति पाने का मार्ग मिल सकता है।
सारांश: जैन धर्म में प्रायश्चित से पाप का भार कम होता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है, परंतु कर्मों का फल अवश्य मिलता है। सच्चे हृदय से प्रायश्चित करना आवश्यक है।