पूर्व भव में पुंडरिक कंडरिक अध्ययन का रोज ५०० पुनरावर्तन करने से ३ वर्ष की वय में ११ अंग के ज्ञाता बने ?
हाँ, यह प्रसंग जैन धर्मग्रंथों में आता है। ऐसा कहा जाता है कि पूर्व भव में एक जीव ने पुंडरिक (कंडरिक) नामक अध्ययन का प्रतिदिन ५०० बार पुनरावर्तन किया था। उस पुण्य के प्रभाव से अगले जन्म में वह तीन वर्ष की अल्पायु में ही ११ अंगों का ज्ञाता (ज्ञान प्राप्त करने वाला) बन गया। यह उदाहरण जैन धर्म में अध्ययन, स्वाध्याय और पुनरावर्तन (रिपीटीशन) के महत्व को स्पष्ट करने के लिए दिया जाता है। यह प्रसंग मुख्यतः ज्ञान के क्षेत्र में पुरुषार्थ और पुण्य के महत्व को दर्शाता है।