उपसर्ग हरण स्तोत्र के27 श्लोकमील सकते है
नीचे उपसर्ग हारण स्तोत्र के जो श्लोक उपलब्ध प्रामाणिक स्रोतों में मिलते हैं, उनमें से पहले 7 श्लोक दिए जा रहे हैं। यह स्तोत्र जैन धर्म में आराधना के लिए प्रिय है। यह बताना जरूरी है कि कुछ संकलनों में कुल 27 श्लोक माने जाते हैं; नीचे केवल वे श्लोक दिए जा रहे हैं जो साफ-साफ प्रकाशित स्रोतों में मिलते हैं:
- उवसग्ग-हरं पासं, पासं वंदामि कम्म-घण मुक्कं ।
विसहर-विस-णिन्नासं, मंगल-कल्लाण-आवासं ।। अर्थ: मैं उवसग्गहरण (उपसर्ग-हार) को नमस्कार करता हूँ; उसके पुण्य-घण्टे की ध्वनि हर कठिनाई को दूर करने वाली है; वह सभी मंगलमय गुणों से परिपूर्ण है।
- विसहर-फुलिंग-मंतं, कंठे धारेइ जो सया मणुओ ।
तस्स गह-रोग-मारी, दुट्ठ जरा जंति उवसामं ।। अर्थ: उसके वचन-गहन मन्त्र सीधे मेरे गले से उतरते हैं; वह रोग-शूल और बुढ़ापा आदि दुखों को जड़ से हटाने वाले हैं।
- चिट्ठउ दुरे मंतो, तुज्झ पणामो वि बहु फलो होइ ।
नर-तिरिएसु वि जीवा, पावंति न दुक्ख-dogacchaṃ ।। अर्थ: चित्त को दूर रखने वाले ये मंत्र मन को शांत करें; इसकी महिमा से जीव नर-लोकों में भी दुख से मुक्त हो सकता है।
- तुह सम्मते लद्धे, चिंतामणि-कप्पपावय-सरिसे ।
पावंति अविग्घेणं, जीवा अयरामरं ठाणं ।। अर्थ: आपकी कृपा-सहायता से मन में चित्त-मणि जैसी पवित्रता आये, और जीवन अजर-अमर स्थिर रहे।
- इह संथुदो महायस! भत्तिब्भर णिब्भरेण हिदयेण ।
ता देव! दिज्ज बोहिं, भवे भवे पास जिणचंदं ।। अर्थ: यहाँ संतोष और महान प्रभाव का संथ (ध्यान) है; हे देव, कृपा करके विविध भवों में स्थिर रहना और जिनचंद के मार्ग को धारण करना।
- ॐ अमरतरु-कामधेणु-चिंतामणि-कामकुंभभमादिया ।
सिरि-पासणाह-सेवाग्गहणे सव्वे वि दासत्तं ।। अर्थ: ओम प्रणव के साथ अमृत-तरु और चित्त-आभूषण (चिन्तामणि) का दिव्य कर्म-केन्द्रण है; यह सभी पापों का नाश कर जीव को उन्नत करता है।
- उवसग्गहरं त्थोत्तं, कादूणं जेण संघकल्लाणं ।
करुणायरेण विहिदं, स भद्दबाहू गुरु जयदु । अर्थ: उवसग्गहरण महाव्रत के साथ संघ-कल्याण के लिए करुणामय सहायता देता है; गुरु की महान कृपा से संन्यास-मार्ग सुगम हो जाता है।
ध्यान दें:
- उपसर्ग हारण स्तोत्र के 27 श्लोक माने जाते हैं, पर ऊपर दिए गए स्रोत कुछ पंक्तियाँ ही प्रकाशित करते हैं; पूर्ण 27 श्लोकों की विश्वसनीय पाठ के लिए स्रोत-पुष्टि जरूरी है।
- Digambar/Shwetambar परंपराओं में कुछ शब्दों की ध्वनि-परिवर्तनी या अनुवाद में हल्का भिन्नता मिल सकती है; मूल इष्टार्थ और प्रयोजन वही रहता है: मन-चित्त को शुद्ध कर मोक्षमार्ग की सहायता।
यदि आप चाहें, मैं इन श्लोकों का अधिक स्पष्ट अर्थ और क्रमबद्ध पाठ ( Digambar बनाम Shwetambar के अनुसार के छोटे-छोटे भेद बताएँ) सरल भाषा में और आगे भी दे सकता हूँ।