Logassa kitne shwas me ginte he
जैन परंपरा में "लोगस्स" (Logassa) स्तोत्र का पाठ एक विशेष विधि से किया जाता है। जब साधु-साध्वी या श्रावक-श्राविका लोगस्स पाठ करते हैं, तो वे आमतौर पर इसे "108 श्वासों" में (या कभी-कभी 27, 54, या 108) पूरा करने की साधना करते हैं। इसका अर्थ है कि लोगस्स स्तोत्र को 108 बार श्वास लेकर (हर बार एक श्वास में एक पाठ) पढ़ना चाहिए। यह अभ्यास आत्म-नियंत्रण, एकाग्रता और तपस्या का प्रतीक है।
संक्षेप में: लोगस्स स्तोत्र का पाठ प्रायः 108 श्वास में गिना जाता है, लेकिन यह संख्या संकल्प और साधना के अनुसार 27, 54, या 108 भी हो सकती है।
संदर्भ:
- जैन आगम, तत्त्वार्थ सूत्र और परंपरागत पूजा विधि
- जैन साधना और तप विधियाँ
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