Kevala jnan prashna
Kevala jnana (केवल ज्ञान) मतलब पूर्ण, निर्विकल्प ज्ञान है—जब आत्मा की सारी कलाओं-आवरण (राग-द्वेष, मैत्री-घृणा आदि) समाप्त हो जाते हैं और उसे सब कुछ ठीक-ठीक, बिना किसी भ्रम के जानने की शक्ति मिलती है। यह आत्मा का पूर्ण ज्ञान है: स्थान, समय, पदार्थ, चर-अचर सभी की वास्तविक और पूर्ण जानकारी मिलना।
मुख्य बिंदु:
- केवल ज्ञान वह अवस्था है जिसमें करण-आवरण घट जाना और कर्मों का प्रभाव शून्य हो जाना चाहिए; तब आत्मा को सर्वज्ञता प्राप्त होती है।
- यह अवस्था केवल तिर्थंकरों और अन्य केवलियों द्वारा संभव मानी जाती है। योग, तप, प्रमाणिक साधना से आत्मा ऐसा शुद्ध-स्थित बना लेती है।
- इसका परिणाम यह है कि उस जीव को जन्म-Death के चक्र से ऊपर उठकर, व्यापक सत्य-ज्ञान, सत्य-व्यवहार और सही निर्णय की क्षमता मिलती है।
दिगंबर और श्वेतांबर परंपराओं में भिन्नताएँ:
- दोनों धाराओं के भीतर केवल ज्ञान के अवसर और उपाधियाँ समान भाव से मानी जाती हैं, पर पाठ-व्याख्या और कुछ संदर्भों में विवरण अलग हो सकता है।
- मुख्य तत्व—आवरण का पूर्ण विनाश, आत्म-ज्ञान की एकाग्रता और सर्वज्ञताय—दोनों के लिए समान रूप से केंद्रीय हैं।
यदि आप चाहें, तो मैं केवल ज्ञान पर मूल जैन स्रोतों के अनुसार अधिक ब्योरे में थोड़ा विस्तार से समझा सकता हूँ, या किसी खास तंत्री/सूत्र के अनुसार व्याख्या दे सकता हूँ।