अहम का अर्थ
अहम (अहमकार) का अर्थ है स्वयं के बारे में गलत पहचान या "मैं-मैं" की भावना। इसका सामान्य रूप से संकेत है कि व्यक्ति स्वयं को आत्मा से अलग, सर्वोच्च या केंद्रीय मान लेता है और अपनी पहचान को अहंकार से जोड़ देता है।
जैन विचार में:
- अहंकार, यानी अहं, आत्मा (जिन्) के वास्तविक स्वरूप की गलत धारणा है।
- यह “मैं कौन हूँ?” और “मुझे चाहिए क्या?” जैसी दुविधाओं को जन्म देता है।
- अहंकार कर्मों को बांधने वाला मुख्य कारण माना जाता है, क्योंकि यह आसक्ति, माया और दुविधा को बढ़ाती है।
- सही vakti में, आत्मा को निरपेक्ष, शांत और निर्गुण मानने की बजाय, अहंकार को घटाकर शुद्ध जीवन, संयम और सम्यक ज्ञान से मोक्ष की दिशा मिलती है।
- सामान्यतः Digambar और Shwetambar दोनों परंपराओं में अहंकार की असत्य पहचान को रोकना और आत्मा की औचित्यपूर्ण प्रकृति को समझना महत्वपूर्ण माना गया है; दोनों में इसका उपचार निभाव में समान अर्थ रखता है, हालांकि उनके साधना-उचारण में शब्द चयन या अनुशासन में सूक्ष्म भिन्नताएं हो सकती हैं।
यदि आप चाहें, मैं इस विषय पर सार-संक्षेप में प्रमुख Jain स्रोतों के पक्ष-विपरीत बिंदुओं को भी स्पष्ट कर सकता हूँ।