Kuldevi aur kuldevta ki puja honi chahiye?
संक्षेप में जवाब: कुलदेवी/कुलदेवता की पूजा सामान्य जैन धर्म का अभिन्न हिस्सा नहीं है। जैन धर्म में मुख्य ध्यान तीरंहर्ताओं, आचार्यों और सिद्धों के उपासना-मार्ग (संघार, ज्ञान और आचार) पर होता है, न कि परिवार के कुल देवी-देवताओं की पूजा पर।
धर्म के भीतर क्या समझें:
- मुख्य लक्ष्य: सही श्रद्धा, सही ज्ञान और सही आचरण के रास्ते से मोक्ष की प्राप्ति।
- कुलदेवी/कुलदेवता की पूजा कुछ क्षेत्रीय या संस्कृति-आधारित प्रथाओं के रूप में दिख सकती है, पर यह Jainism की मूल शिक्षाओं के अनुरूप नहीं मानी जाती और न ही इसे मोक्ष का वैकल्पिक मार्ग माना जाता है।
- Digambar और Shwetambar दोनों परंपराओं में भी यह बात स्पष्ट है कि तीरंहर्ताओं के अलावा कुल-देवताओं की पूजा को प्राथमिक spiritual मार्ग के रूप में नहीं लिया जाता; कुछ जगहों पर सामाजिक रीति-रिवाज के तौर पर संरक्षित किया जा सकता है, लेकिन उसे धार्मिक आचार-धारणा के तौर पर अनिवार्य नहीं माना जाता।
यदि आप चाहें, मैं इस विषय पर Digambar बनाम Shwetambar परंपराओं की संकीर्ण विभेद (यदि किसी दिन differences हैं) साफ-साफ बताकर और किस प्रकार Jain साधना-मार्ग से जुड़ा हुआ है, उसका सार समझा सकता हूँ।