मतिज्ञान और मनपर्यवज्ञान दोनों जैन के ही विषय हैं
हाँ, मतिज्ञान और मनपर्यवज्ञाने दोनों जैन धर्म के ज्ञान प्रकारों में शामिल हैं।
- मतिज्ञान (Mati-jnana): यह वह ज्ञान है जो इन्द्रियों और पर्यवेक्षण के माध्यम से सामान्य sensory अनुभव से प्राप्त होता है, जैसे प्रत्यक्ष ज्ञान (direct perception) की अनुभूति। इसे प्रकृत रूप से नीचे की जड़ में मानते हैं, और यह बाहरी विश्व की जानकारी देता है।
- मनपर्यवज्ञाना (Manah-paryavijnana): यह मन से जुड़कर होने वाला ज्ञान है, जिसे जैन दर्शन में मानसिक या अवलोकन-सम्बन्धी शक्तियों के द्वारा माना गया है (जैसे मानसिक संवेगों से सूचना प्राप्त करना)। इसे प्रत्यक्ष इंद्रियगम से अलग मानते हैं और इसे कुछ परिस्थितियों में दिव्य शक्तियों के रूप में भी वर्णित किया गया है।
नोट:
- जैन सिद्धांतों में ज्ञान के अन्य प्रकार भी माने जाते हैं, जैसे स्मृति-निधि (श्रुति), अवधी (आडविध ज्ञान), आदि—पर मतिज्ञान और मनपर्यवज्ञाना दोनों सीधे जैन epistemology/ज्ञान के मान्यता प्राप्त पंक्ति में आते हैं।
यदि आप चाहें, मैं इन विषयों के लिए Digambar-Śvetāmbar के विशिष्ट मतभेदों के छोटे-से सार भी दे सकता हूँ।