यह गलत है धर्मास्तिकाय आदि अरूपी होते हैं
संक्षेप में जवाब: हाँ, धर्मस्तिकाय (धर्म-तत्तvaro) और अधर्मस्तिकाय आरूपी (अरूपी) हैं।
- what are they: जैन दर्शन में पदार्थों के 7 तत्व (तत्त्व) माने जाते हैं: जीव (जीव तत्व) और अजीव। अजीव में भी पुद्गल, धर्मतत्त्व (धर्मस्तिकाय) और अधर्मतत्त्व (अधर्मस्तिकाय) जैसे तत्व आते हैं।
- आरूपी होने का अर्थ: आरूपी/अरूपी का मतलब है इनके पास कोई बनावट या रूप नहीं है, यानी वे रूपी नहीं हैं। धर्मस्तिकाय और अधर्मस्तिकाय अत्यंत सूक्ष्म, बिना ठोस आकार के तत्व हैं जो गति-स्थिरता (चालक-चालकत्व) के माध्यम बनते हैं।
- भूमिका: धर्मतत्त्व वह शक्ति है जो गति को प्रेरित/सम्बद्ध करती है; अधर्मतत्त्व वह जो अंतर-गत्य (घटक) के विरोधी अड़चनें प्रदान कर सकता है ताकि गति-रुद्धि हो सके। ये दोनों तत्त्व अजीव पदार्थ हैं, न कि जीव-तत्व, फिर भी वे स्पर्श, स्पर्श-संवेग आदि के अति सूक्ष्म आयाम होते हैं।
- Digambar vs Shvetambar: दोनों संप्रदायों में यह मौलिक विचार सामान्य है—धर्मस्तिकाय और अधर्मस्तिकाय अरूपी हैं। कुछ तपस्वी-परिपाटी या मत-मतांतरों में इन tattvas के व्याख्या की सूक्ष्म प्रस्तुतियाँ अलग हो सकती हैं, पर इनका मूल विचार कि वे रूपरहित सूक्ष्म तत्व हैं, समान ही रहता है।
यदि आपको किसी शिक्षक की खास व्याख्या या श्लो kwam/aarti में Дар्शन मिलती हो, तो बताइए, मैं उसी संदर्भ के अनुसार सरल अर्थ और प्रमाण दे दूँगा।