धर्म परीक्षा में पास हुये, धर्मलाभ पाकर धन्य हुये
यह वाक्य कहता है: धर्म परीक्षा में सफलता पाकर Dharma-लाभ हुआ और इसलिए व्यक्ति धन्य हो गया।
सार अर्थ:
- धर्म परीक्षा: जीवन में आचार, विचार और व्यवहार के कठिन परीक्षणों से गुजरना—यानी नैतिक सिद्धांतों के अनुरूप स्थिति-संयम और सही निर्णय लेना।
- धर्मलाभ: इन-testing से आत्मा का शुद्धि-योग लाभ प्राप्त होना, यानी virtuous conduct और सही ज्ञान–विकल्पों से कर्मों का पवित्र होना।
- धन्य होना: ऐसी धर्मिक उपलब्धि के कारण आत्मा के लिए सुख-शांति और मोक्ष की दिशा में यात्रा में प्रगति होना।
जैन धरों में ये विचार आम तौर पर:
- सम्यक दर्शन, ज्ञान और चारित्र के संयोजन (त्रयीण तत्त्व) से होता है।
- ताप-धर्म, संयम, अहिंसा, सत्य और अपरिग्रह जैसे आचारों को स्थिर रखने पर आत्मा शुद्ध होकर Dharma-लाभ को प्राप्त करती है।
- जीवन के निजी और सामाजिक व्यवहार में संयम, एकाग्रता और अहिंसा की निरंतरता से ही धर्म परीक्षा आसान होती है और आत्मा को मुक्तिपथ मिलता है।
यदि आप चाहें, मैं इस विषय पर और अधिक स्पष्ट, सुसंगत रूप से संबद्ध जैन शास्त्रों के अर्थ (arth) के साथ विस्तार से समझा दूँ।