कौन धर्म परीक्षा में पास हुये, धर्मलाभ पाकर बने?
संक्षेप में उत्तर:
- धर्म परीक्षा या धर्म-परिक्षा का सही अर्थ है जीवन में सही आचरण, स्वाध्याय, परमार्थ के लिए कठोर तप और विचार-विचार से निर्भीक रहने की योग्यता—यानी आत्म-नियंत्रण और संयम से हर प्रकार के अधर्म को त्यागना।
- जो लोग इस प्रकार की धर्म-प्राप्ति (धर्म-लाभ) पाते हैं, वे अंततः मोक्ष या मुक्ती के मार्ग पर पहुँचते हैं।
- हिन्द-जैन धरा-धर्म में इसे मुख्य रूप से तत्त्वज्ञान, सम्यक दर्शन-ज्ञान-चारित्र पर आधारित माना गया है।
- सबसे ऊँचे स्तर पर सभी 24 तीर्थंकरों ने अपने-अपने समय में कर्मों को काटकर, सम्यक दर्शन-सम्यक ज्ञान-सम्यक चारित्र को प्राप्त किया और Moksha (मोक्ष) को पाया। यह “धर्म-पास” का चरम रूप है; तीर्थंकर वही हैं जिनके द्वारा धर्म-मार्ग का पालन पूर्णत: सफल होता है।
- व्यवहारिक अर्थ में, आज के संदर्भ में भी जो व्यक्ति संयम-आचरण, अहिंसा, सत्य, अन्न-परिग्रह आदि पर टिके रहते हैं और आत्म-परिष्कार करते हैं, वे धर्म-लाभ प्राप्त करके आत्म-सुख और अंततः मोक्ष के करीब जाते हैं।
- डायगम्बर और श्वेताम्बर परंपराओं के बीच इस अर्थ में मूल भिन्नता नहीं है—दोनों ही धाराओं में धर्म-परिक्षा का उद्देश्य वही है: नित्यानुपालक आचरण से मोक्ष।
यदि आप चाहें, मैं इसे सरल श्लोक/पद के साथ समझा दूँ या कोई खास तीर्थंकर-कथा बताकर उदाहरण दे दूँ।