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ज़रूर. Jain दर्शन में सात नायाएँ (sapta naya) बताई जाती हैं, हर एक नाय एक विशिष्ट पक्ष से वस्तु/स्थिति को समझाने का तरीका है। वस्तु के अनेक अंग होते हैं (anekant), इसलिए सभी नाय मिलकर पूर्ण सच का भाग-भाग चित्र बनाते हैं।
जैन धर्म के सात नायाएँ (Nayas)
- Naigama-naya: सामान्य या सार्वभौमिक दृष्टिकोण। वस्तु की सामान्य दिशा या लक्ष्यों को दिखाता है, विवरण अक्सर अनिर्दिष्ट रहते हैं।
- Sangraha-naya: संक्षेप या वर्ग-आधार दृष्टिकोण। वस्तु को वर्ग (जैसे सभी फल) के रूप में देखता है, उसके विशिष्ट उप-वस्तुओं को छोड़कर।
- Vyavahara-naya: व्यवहारिक/व्यवहारिक दृष्टिकोण। दैनिक जीवन में प्रयुक्त विशिष्ट विवरणों पर केंद्रित होता है (यह क्या है, यह कैसे काम करता है आदि)।
- Rijusutra-naya: रिजुसूत्र नयीया; क्षण-समय (momentariness) के अनुसार देखना—वर्तमान क्षण का पक्ष।
- Sabda-naya: शब्द-संकेत/शब्दार्थ के आधार पर दृष्टिकोण। शब्द के अर्थ, लिंग-वचन-प्रयोग आदि के परिप्रेक्ष्य को समझना।
- Samabhirudha-naya: व्युत्पत्ति-आधारित (एतिमोलॉजिकल/शब्द के नाम से उसका वास्तविक अर्थ) दृष्टिकोण।
- Evambhuta-naya: वास्तविक/तथ्यात्मक दृष्टिकोण। विषय के ठोस, Concrete वास्तविक व्यवहार या स्थिति को ही मानना।
इन सातों नायाओं के माध्यम से एक वस्तु पर कई सत्य (syadvada) निकलते हैं—हर नाय अपने तरीके से सही है, पर अकेले उसे पूर्ण सत्य नहीं कहा जा सकता; सभी मिलकर पूर्ण योग को दर्शाते हैं।
ध्यान देने योग्य बातें
- प्रचलित Jain-संस्करणों में ये सात नायाएँ आम तौर पर एक ही क्रम में बताई जाती हैं, और दोनों प्रमुख संप्रदाय (Digambara/Shvetambara) इनमें किसी बड़े विभेद के बिना मानते हैं, though व्याख्याओं में कभी-कभी पंक्तिबद्ध विवरण या उदाहरणों में भिन्नता मिलती है।
- nayavāda का मूल उद्देश्य किसी एक बात को एक-एक दृष्टिकोण से समझकर, बहुविकल्पीय/बहु-आयामी वास्तविकता को स्वीकारना है—यही syādvāda केergen में प्रकट होता है।