जैन धर्म में दूसरों के अवगुण देखना कौन सी दृष्टि कहलाती है
यह दृष्टि “मिथ्यादृष्टि” (मिथ्यात्व/ Mithyadrishti) कहलाती है।
- मतलब: सही वास्तविकता को न मानना या एकतरफा गलत धारणा रखना। जैन सिद्धांत में इसे अवगुणदृष्टि, यानी गलत दृष्टि भी कहा गया है और यह आत्मा की पवित्रता के रास्ते में बाधा बनती है।
- धर्म-कथा के अनुसार: मिथ्यादृष्टि Gunasthāna में सबसे पहली अवस्था है ( Mithyadrishti Gunasthānak ), जिसमें व्यक्ति सही मार्ग को नहीं मानता और दोषपूर्ण Believe रखता है। यह बहुत कम samyakdrishti (ठीक दर्शन) के साथ रहता है। ( jainknowledge.com)
- Digambar-Shvetambar दोनों परंपराओं में यह विचार मिलती-जुलती तरह से रहती है, भिन्न शब्दावलियों के थोड़े अंतर के साथ भी मूल अर्थ वही रहता है। ( jainworld.jainworld.com)
संक्षेप में: दूसरों के अवगुण देखने की प्रवृत्ति मिथ्यादृष्टि ( Mithyadrishti ) है, जो गलत दृष्टि के कारण कर्मिक बंधन बढ़ाती है।