ॐ ही श्रीं अर्ह नमः इस मंत्र का जाप के क्या फल है
यह मंत्र “ॐ Namo Arihantanam Namah” (आप ने जो लिखा है उसका छोटा रूप है) को जैन धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है। इसका अर्थ और फल नीचे सरल शब्दों में है:
- معنى (arth): मैं Arihant (जो स्वयं की घटनाओं से मुक्त हो चुके enlightened) को प्रणाम करता/करती हूँ और OM का सम्मान करता/करती हूँ। इसका लक्ष्य श्रावक के मन, चित्त और आचरण को शुद्ध करना है।
- मानसिक शुद्धि और संयम: सारं मन को शांत कर, मनमथन (मन के विकराल भाव) को कम करता है।
- आसक्ति और पापों में कमी: लोभ, मोह, ममता जैसे चक्रों से दूरी बनाने में मदद करता है।
- धर्म-मार्ग की दृढ़ता: सत्संगति में वृद्धि, सही आचरण और सच्चे विश्वास की ओर प्रेरित करता है।
- मोक्ष के मार्ग की दिशा: karmic बंधनों को कम करने और जीव के निर्वाण की toward प्रगति में सहयोगी रहता है।
- किन परिस्थितियों में सुनें/जाप करें:
- यह एक गुरु-भक्ति और आत्म-चिंतन का माध्यम है; मंत्र जप अकेले से मोक्ष नहीं मिलता, पर यह एक समर्पित साधना का हिस्सा बनकर anderen अभ्यासों (ध्यान, पंच-शील, सम्यग्दर्शन आदि) के साथ लाभ देता है।
- दिगंबर-श्वेताम्बर परंपराओं में इस मंत्र के उच्चारण-रवैये और महत्व में कुछ छोटे-छोटे भिन्न अर्थ हो सकते हैं, पर मूल उद्देश्य समान रहता है: Arihantों को प्रणाम और जीव की आत्म-शुद्धि।
यदि आप चाहें, मैं इस मंत्र का शुद्ध मूल पाठ और अर्थ ( Digambar और Shwetambar दोनों परंपराओं के अनुसार) भी दे सकता/सकती हूँ।