karm bandhan kese hota
जैन धर्म के अनुसार, "कर्म बंधन" (कर्मों का बंधना) आत्मा और कर्मों के कणों के बीच संबंध है। जब हम सोचते, बोलते या कोई कार्य करते हैं—चाहे वह शुभ (अच्छा) हो या अशुभ (बुरा)—तो हमारी आत्मा पर कर्म के सूक्ष्म कण बँध जाते हैं। इसे ही कर्म बंधन कहा जाता है।
कर्म बंधन मुख्य रूप से चार कारणों से होता है, जिन्हें "कौशल" या "कसय" कहा जाता है:
- अविरति: संयम का अभाव (संयम न रखना)
- अज्ञान: मिथ्यात्व या गलत मान्यताएँ
- प्रमाद: लापरवाही या आलस्य
- कषाय: क्रोध, मान, माया, लोभ - ये चार कषाय सबसे ज्यादा कर्म बंधन का कारण बनते हैं
जब हम इन कषायों के साथ कोई गतिविधि करते हैं, तो आत्मा पर कर्म के कण आकर्षित होकर चिपक जाते हैं। यही कर्म बंधन है। जितना अधिक हम कषायों में रहते हैं, उतना अधिक कर्म बंधन होता है।
कर्म बंधन रोकने के लिए जैन धर्म में संयम, सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र का पालन करना आवश्यक माना गया है।