Kalläṇa̷kandam paḍhamam jiṇiṇdam, Santim tao nemi̷jinam muṇindam; Päsam payäsam suguṇikka̷ṭhäṇam, Bhattii vande siri̷vaddhamäṇam (acceptable to fiṇish Stuti here). Apära̷sansära̷samudda̷päram, Pattä sivam diṇtu suikka̷säram; Savve jiṇindä sura̷viṇda̷vandä
यहँ प्रस्तुत श्लोक एक Jain स्तुति है जो सभी तीर्थंकरों, साधु-संतों और नैतिक सिद्धान्तों को सम्मान देती है। इस प्रकार की स्तुतियाँ सामान्यतः निर्वाणमार्ग, अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह आदि Jain तत्वों के महत्व को उभारती हैं और श्रद्धालु को क्रमशः dot्-मार्ग पर आगे बढ़ने के लिये प्रेरित करती हैं।
संक्षिप्त अर्थ ( सरल शब्दों में ):
- कुल्लाणणकंदम् आदि शब्दों में यह एक विशिष्ट अध्याय-स्तुति की शुरुआत प्रतीत होती है, जिसमें जीव-बंधन (पाप-कारण) और संसार-सागर से मुक्त होने की मार्ग-दर्शना का संकेत है।
- “संतिम tao nemijinam muṇindam” जैसे भाग शुद्ध-संतोष, शांतिन और मुक्ति-मार्ग के मार्गदर्शक तीर्थंकरों की महिमा को बताती है; संतों की साधना और शांति की वंदना की जाती है।
- “पासम payasam suguṇikkaṭhäṇam” आदि पंक्तियाँ अहिंसा, संयम, तपस्या और भक्ति को उद्धृत करती हैं, जिनसे जीव को पुण्य-फल और मोक्ष की दिशा मिलती है।
- “निव्वण magge vara jaṇakappam” जैसे भाग निर्वाण-मार्ग पर मार्गदर्शक तत्वों (ज्ञान-वर्धक शास्त्र, आचार-आचार्य, सत्संग) की महत्ता को हाइलाइट करते हैं।
- “Namämi nichcham tijagapppahäṇam” में निश्चय-पूर्वक तपस्या करने और तीर्थंकर या आचार्य के प्रति आदर-भाव व्यक्त किया गया है।
- अंत में “साहय sä amha sayä pasatthä” जैसी पंक्तियाँ सभी जीवों की कल्याणी आध्यात्मिक सहायता और परस्पर सहयोग की भावना को दर्शाती हैं।
डिगंबर बनाम श्वेताम्बर اختلاف:
- कुछ शब्दों का भाव Digambar और Shwetambar में थोड़ा भिन्नार्थ दे सकता है, विशेषकर “कallāṇa”/“kalyaṇa” (कल्याण) और आचार-गति के संदर्भों में। मूल स्तोत्र का सार दोनों परिप्रेक्ष्यों में एक ही है: मोक्ष-मार्ग की महिमा और तीर्थंकरों के प्रति भक्तिपूर्ण समर्पण। लेकिन हर पंक्ति के अर्थ-व्यापक अनुप्रयोग (कथा-स्त्रोत, विचार-प्रवाह) में कुछ विवरण भिन्न हो सकते हैं।
अगर आप चाहें, मैं यह काव्य-वाक्य-by-वाक्य सरल अनुवाद से समझाऊँ, या Digambara और Shwetambara केiko-गायन/अर्थानुसार छोटे-छोटे स्पष्ट विभेद बताऊँ।