kalläṇa kandam stuti
कल्लाण-कंदं स्तुति (Kallana Kandam Stuti)
Original text (स्तोत्र भाग): कल्लाणकंदं पढमं जिणिंदं संतिं तओ नेमिजिणं मुणिदं, पासं पायसं सुगुणिक्कठाणं , भत्तीइ वंदे सिरि-वद्धमाणं.............१
अपार संसार समुद्दपारं, पत्ता सिवं दिंतु सूइक्कसारं, सव्वे जिणींदा सुरविंदवंदा, कल्लाण-वल्लीण-विसाल-कंदा............२
निव्वाण-मग्गे वर-जाण-कप्पं, पणासिया सेस कुवाइ-दप्पं; मयं जिणाणं सरणं बुहाणं, नमामि निच्चं तिजगप्पहाणं,..............३
कुंदिंदु-गोक्खीर-तुसा-रवन्ना , सरोज-हत्था-कमले-निसन्ना , वाअेसिरी पुतथ्य-वग्ग-हत्था , सुहाय सा अम्ह सया पसत्था..............४
Meaning (arth):
- सभी तीर्थंकरों के प्रथम जिनेन्द्र ऋषभदेव, शांतिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ और महावीर के प्रति विनय-आदर व्यक्त किया जाता है; उनके शील-गुणों की वंदना की जाती है (स्तोत्र के प्रथम पंक्ति). 1
- संसार-सागर को पार कर चुके जिनों की महिमा और समस्त जैन-देवताओं द्वारा सम्मानित संपूर्ण जैन-गुणों का महत्त्व कहा गया है; वे सारे जिन-गण इस पंक्ति में स्मरण होते हैं. 2
- निर्वाण-अध्याय मार्ग पर ordained वर-जाण-कप्प (निर्वाण का मार्ग) और जैन-शास्त्रों (आगम) की महिमा का उल्लेख; जिणाणं साधना-शरण में नमन्. 3
- कमल-झलक-गौंण-हाथ, सरोज-हात्ता-कमले-निसन्ना (कमल-हस्त-सज्जा) और सरस विद्यापीठ देवी सरस्वती की कृपा की मंगल-कांक्षा के साथ, पठन-चर्चा तथा अध्ययन-गत्य के लिए वंदना. 4
Dedication:
- चित्त-शांति, मोक्ष-लाभ और ज्ञान-वर्धन के लिए भगवन-जिनों तथा सरस्वती देवी की साधना में स्थिर रहने की अभिलाषा।
ध्यान रखें:
- इस स्तुति के मूल पाठ और अर्थ सामान्यतः Digambar और Shwetambar दोनों परंपराओं में समान रहते हैं; Pronunciation में कभी-कभी छोटे-छोटे स्वरों की भिन्नताएं हो सकती हैं, पर सार वही है।
- कुछ स्रोतों में पाठ के छोटे-छोटे शब्द-संयोजन अलग-थलग दिख सकते हैं, पर विष्णु-गुण और मोक्ष-मार्ग के प्रति श्रद्धा और समर्पण समान रहता है।