karm bandhan kese hota in hindi
जैन धर्म के अनुसार, कर्म बंधन (कर्म बंध) आत्मा और कर्मों के अणुओं के संयोग को कहते हैं। जब जीव (आत्मा) अशुभ या शुभ कार्य करता है, तो उसकी गतिविधियाँ (मन, वचन, काया) तथा उसके कषाय (राग, द्वेष, मोह, क्रोध, मान, माया, लोभ) के कारण कर्म के सूक्ष्म कण आत्मा से बंध जाते हैं।
कर्म बंधन के मुख्य कारण:
- अज्ञान (अविवेक) – सही और गलत का ज्ञान न होना।
- कषाय – क्रोध, मान, माया, लोभ आदि।
- इन्द्रिय-विषयों में आसक्ति – सुख-दुख की इच्छा।
- अशुद्धि पूर्ण भाव – मन, वचन और काया से गलत कार्य करना।
कर्म बंधन की प्रक्रिया:
- जब जीव कषायों से ग्रस्त होकर कोई कार्य करता है, तो उस समय उसके द्वारा उत्पन्न भावों के अनुसार कर्म के कण आत्मा से जुड़ जाते हैं।
- जैसे, क्रोध से घृणा के कर्म, लोभ से मोहनीय कर्म आदि बंधते हैं।
कर्म बंधन रोकने के उपाय:
- सम्यक्दर्शन, सम्यक्ज्ञान और सम्यक्चारित्र धारण करना।
- राग-द्वेष, कषाय आदि का त्याग करना।
- तप, संयम और ध्यान करना।
इस प्रकार, जैन धर्म में कर्म बंधन मन, वचन और काया के अशुद्ध भावों के कारण होता है, तथा इन भावों के शुद्धिकरण से ही कर्म बंधन से मुक्ति पाई जा सकती है।