जैन धर्म के अनुसार, कर्म (कर्मों) की फल देने की शक्ति स्वयं कर्मों में ही निहित होती है। इतने सूक्ष्म परमाणु में इतनी शक्ति केसे आ गयी
जैन धर्म के अनुसार, कर्म (कर्म) सूक्ष्म पुद्गल (पदार्थ) के रूप में माने गए हैं, जिन्हें 'कर्मकण' कहा जाता है। जब जीव (आत्मा) अशुभ या शुभ भावों के साथ कार्य करता है, तो वह अपने ऊपर इन कर्मकणों को बाँध लेता है। ये कर्मकण आत्मा से जुड़कर उसके विभिन्न भावों और कार्यों के अनुसार परिणाम (फल) देते हैं।
जैन दर्शन में यह माना जाता है कि हर कर्मकण में विशिष्ट प्रकार की शक्ति (ऊर्जा) निहित होती है। यह शक्ति आत्मा के साथ जुड़ने पर उसके भावों और प्रवृत्तियों के अनुसार फलित होती है। यह शक्ति कहाँ से आती है—इसका उत्तर जैन धर्म में यह है कि प्रकृति (प्रकृति के छह द्रव्य: जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल) का नियम और स्वभाव ही ऐसा है कि पुद्गल द्रव्य में विभिन्न प्रकार की शक्तियाँ होती हैं, और जब वह कर्म रूप में आत्मा से जुड़ता है, तो वह अपने परिणाम देने लगता है।
जैन आगमों के अनुसार, कर्मकणों में फल देने की शक्ति उनके स्वभाव (गुणधर्म) द्वारा आती है। यह शक्ति जन्मजात है, अर्थात यह प्रत्येक कर्मकण के स्वभाव में ही निहित है। जैसे अग्नि का स्वभाव जलाना है, वैसे ही कर्मकण का स्वभाव आत्मा से जुड़कर उसके अनुसार फलित होना है। यह न कोई बाहरी शक्ति है और न ही किसी अन्य कारण से आती है। कर्मकणों की यह शक्ति अनादि और प्राकृतिक है, क्योंकि जैन दर्शन में सृष्टि का न कोई आदि है और न अंत।
इसलिए, जैन मत के अनुसार, इतने सूक्ष्म कर्मकणों में शक्ति उनके स्वभाव और प्रकृति के कारण स्वयमेव है, और यही कर्म सिद्धांत का मूल सूत्र है।